Transliteration: (Wa minan naasi mai ya'budul laaha 'alaa harfin fa in asaabahoo khairunit maanna bihee wa in asaabat hu fitnatunin qalaba 'alaa wajhihee khasirad dunyaa wal aakhirah; zaalika huwal khusraanul mubeen)
"और लोगों में से कोई ऐसा भी है जो एक किनारे पर रहकर (शक व दुविधा में) अल्लाह की इबादत करता है [28]; फिर अगर उसे कोई फ़ायदा (ख़ुशहाली) पहुंचे तो उससे मुतमइन हो जाता है [29], और अगर उसे कोई आज़माइश (तकलीफ़) पहुंचे तो अपने मुंह के बल (कुफ़्र की तरफ़) पलट जाता है; उसने दुनिया भी गंवाई और आख़िरत भी; यही तो खुला हुआ ख़सारा (नुक्सान) है [30]!"
यहाँ कमज़ोर ईमान वाले मुनाफ़िक़ीन का ज़िक्र है जो पूरे इख़्लास के साथ इस्लाम में दाख़िल नहीं होते बल्कि एक किनारे पर खड़े रहते हैं कि देखें नफ़ा होता है या नुक़्सान।
अगर इस्लाम लाने के बाद उनकी तिजारत में नफ़ा हो, औलाद हो और सेहत रहे, तो कहते हैं कि यह दीन बहुत अच्छा है। लेकिन अगर आज़माइश के तौर पर कोई बीमारी या नुक़्सान आ जाए, तो बद-गुमान होकर दोबारा कुफ़्र की तरफ़ पलट जाते हैं।
ऐसे लोगों ने दुनिया भी गंवाई (क्योंकि तक़दीर का नुक़्सान तो होकर रहा) और आख़िरत भी तबाह कर ली (क्योंकि कुफ़्र पर मरने से जहन्नमी हुए)। यही सबसे खुली और अज़ीम बर्बादी है।
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