कुरान - 22:25 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

25
إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ ٱلَّذِي جَعَلۡنَٰهُ لِلنَّاسِ سَوَآءً ٱلۡعَٰكِفُ فِيهِ وَٱلۡبَادِۚ وَمَن يُرِدۡ فِيهِ بِإِلۡحَادِۭ بِظُلۡمٖ نُّذِقۡهُ مِنۡ عَذَابٍ أَلِيمٖ

Transliteration: (Innal lazeena kafaroo wa yasuddoona 'an sabeelil laahi wal Masjidil Haraamil lazee ja'alnaahu linnaasi sawaaa'anil 'aakifu feehi walbaad; wa mai yurid feehi bi ilhaadim bizulmin nuziqhu min 'azaabin aleem (section 3))

25. बेशक जो लोग काफ़िर हुए और वे अल्लाह की राह से रोकते हैं [51] और उस मस्जिद-ए-हराम (काबा) से [52] जिसे हमने सब इंसानों के लिए एक जैसा बनाया है—वहाँ का रहने वाला हो या बाहर से आने वाला मुसाफ़िर [53]; और जो शख़्स भी उसमें किसी ज़ुल्म या कज-रवी (नाफ़रमानी) का इरादा करेगा [54], हम उसे दर्दनाक अज़ाब का मज़ा चखाएंगे [55] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 25 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 25 की तफ़सीर

"बेशक जो लोग काफ़िर हुए और वे अल्लाह की राह से रोकते हैं [51] और उस मस्जिद-ए-हराम (काबा) से [52] जिसे हमने सब इंसानों के लिए एक जैसा बनाया है—वहाँ का रहने वाला हो या बाहर से आने वाला मुसाफ़िर [53]; और जो शख़्स भी उसमें किसी ज़ुल्म या कज-रवी (नाफ़रमानी) का इरादा करेगा [54], हम उसे दर्दनाक अज़ाब का मज़ा चखाएंगे [55] ।"

[51] अल्लाह की राह और मस्जिद-ए-हराम से रोकना

इससे मुराद वे मुशरिकीन हैं जिन्होंने हुदैबिया के मौक़े पर हुज़ूर अकरम ﷺ और सहाबा-ए-किराम को उमरा करने और काबा की ज़ियारत से रोका था। यह आयत मदीना मुनव्वरा में नाज़िल हुई और इसमें वाज़ेह फ़रमाया गया कि मस्जिद-ए-हराम में इबादत करने से किसी को रोकने का हक़ किसी को नहीं है।

[52] मस्जिद-ए-हराम की वुसअत व अहकाम

मस्जिद-ए-हराम से मुराद ख़ास बैतुल्लाह, मस्जिद का अहाता, या पूरा हरमे मक्का है। हनफ़ी फ़ुक़हा के नज़दीक पूरे हरमे मक्का की ज़मीनों को बेचना या किराए पर देना जाइज़ नहीं है क्योंकि यह सब इंसानों के लिए वक़्फ़ की हैसियत रखता है।

[53] मुक़ीम और मुसाफ़िर के मसावी हुक़ूक़

मक्के का बाशिंदा हो या दुनिया के किसी भी कोने से आने वाला मुसाफ़िर, तवाफ़ और नमाज़ और इबादत के मामले में सब बराबर का हक़ रखते हैं। किसी को किसी पर ज़ाती तफ़ाउक़ हासिल नहीं।

[54] हरम शरीफ़ में ज़ुल्म व गुनाह का इरादा

यह आयत अब्दुल्लाह बिन अनीस के बारे में नाज़िल हुई जिसने एक मुसलमान को क़त्ल करके मक्के की तरफ़ फ़रार इख़्तियार किया था। हरम की हुर्मत को पामाल करना और वहाँ ज़ुल्म व गुनाह का इरादा करना अज़ाबे अज़ीम का बाइस है।

[55] हरमे मक्का में गुनाह की शिद्दत

हरमे मक्का की यह ख़ास ख़ुसूसियत है कि वहाँ गुनाह का इरादा करने पर भी पकड़ होती है। हरम शरीफ़ में एक नेकी का सवाब एक लाख (1,00,000) नेकियां हैं, और गुनाह भी एक लाख गुना संगीन हो जाता है। (जबकि मदीना मुनव्वरा में नेकी का सवाब 50,000 गुना है और गुनाह सिर्फ़ एक ही लिखा जाता है और इरादे पर पकड़ नहीं होती)।

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