कुरान - 22:29 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
ثُمَّ لۡيَقۡضُواْ تَفَثَهُمۡ وَلۡيُوفُواْ نُذُورَهُمۡ وَلۡيَطَّوَّفُواْ بِٱلۡبَيۡتِ ٱلۡعَتِيقِ

Transliteration: (Summal yaqdoo tafasahum wal yoofoo nuzoorahum wal yattawwafoo bil Baitil 'Ateeq)

29. 'फिर चाहिए कि वे अपना मैल-कुचैल दूर करें (एहराम खोलें) [65], और अपनी मन्नतें पूरी करें [66], और उस पुराने घर (बैतुल अतीक़/काबा) का तवाफ़ करें [67] ।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 29 की तफ़सीर

"'फिर चाहिए कि वे अपना मैल-कुचैल दूर करें (एहराम खोलें) [65], और अपनी मन्नतें पूरी करें [66], और उस पुराने घर (बैतुल अतीक़/काबा) का तवाफ़ करें [67] ।'"

[65] एहराम से फ़राग़त और हलक़ व क़स्र

हज के अरकान (रमी व क़ुर्बानी) के बाद एहराम की पाबंदियां ख़त्म करने के लिए सर मुंडाना या बाल कतरवाना (हलक़ या क़स्र) और नाख़ून तराशना होता है जिससे ज़ाहिरी मैल-कुचैल दूर हो जाता है और एहराम खुल जाता है।

[66] नज़र (मन्नत) की पाबंदी

जो शरई नज़रें (मन्नतें) इंसान अल्लाह के लिए मानता है, उन्हें पूरा करना वाजिब है। नीज़ सुन्नत व मुस्तहब आमाल को भी हुस्ने नीयत से पूरा करना अज़ीम सवाब का बाइस है।

[67] तवाफ़े ज़ियारत (तवाफ़े इफ़ाज़ा)

काबा मुअज़्ज़मा को 'बैतुल अतीक़' (आज़ाद घर या क़दीम तरीन घर) फ़रमाया गया क्योंकि अल्लाह ने इसे ज़ालिमों के तसल्लुत से आज़ाद रखा है। 10 से 12 ज़िल्हिज्जा के दरमियान तवाफ़-ए-ज़ियारत करना हज का रुक्न-ए-अज़ीम (फ़र्ज़) है।

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