Transliteration: (Faka ayyim min qaryatin ahlaknaahaa wa hiya zaalimatun fahiya khaawiyatun 'alaa 'urooshihaa wa bi'rim mu'at talatinw wa qasrim masheed)
"पस कितनी ही बस्तियाँ हैं जिन्हें हमने हलाक कर दिया जबकि वे ज़ालिम थीं [100], तो वे अपनी छतों के बल गिरी पड़ी हैं [101], और कितने ही कुएं बेकार पड़े हैं और कितने ही पक्के (मज़बूत) महल वीरान हो चुके हैं!"
जब किसी बस्ती के लोग ज़ुल्म, कुफ़्र और सरकशी में हद से बढ़ जाते हैं, तो अल्लाह का अज़ाब उन पर टूट पड़ता है। अज़ाब-ए-इलाही सिर्फ़ इंसानों ही को नहीं बल्कि उनके तमाम साज़ो-सामान को भी बर्बाद कर देता है। इंसान कायनात का मर्कज़ है; जब वह अपने मक़सदे तख़लीक़ (अल्लाह की बन्दगी) को छोड़ देता है, तो उसकी बस्तियां भी हलाक कर दी जाती हैं।
वे बस्तियां इस तरह बर्बाद हुईं कि पहले उनकी छतें गिरीं और फिर दीवारें उनके ऊपर आ पड़ीं। उनके मीठे पानी के कुएं बे-आबाद हो गए और आलीशान चूने-गच मज़बूत महल खाली और वीरान पड़े रह गए। अरब के लोग अपने तिजारती सफ़रों में इन वीरान खंडरात के पास से गुज़रते थे, मगर बद-बख़्ती से कोई सबक़ हासिल न करते थे।
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