Transliteration: (Afalam yaseeroo fil ardi fatakoona lahum quloobuny ya'qiloona bihaaa aw aazaanuny yasma'oona bihaa fa innahaa laa ta'mal absaaru wa laakin ta'mal quloobul latee fissudoor)
"तो क्या ये लोग ज़मीन में चले-फिरे नहीं [102] कि उनके ऐसे दिल होते जिनसे वे समझ सकते या ऐसे कान होते जिनसे वे सुन सकते [103]? हक़ीक़त यह है कि (सिर्फ़) आंखें अंधी नहीं होतीं, बल्कि वे दिल अंधे हो जाते हैं जो सीनों के अंदर हैं [104] !"
ज़मीन में सफ़र करने और गुज़री हुई क़ौमों के उजड़े दयार देखने से इंसान को इब्रत हासिल करनी चाहिए। इससे बुज़ुर्गाने दीन के मज़ारात-ए-मुक़द्दसा की ज़ियारत की अहमियत भी साबित होती है—नेक बन्दों के मज़ारात देखने से दिल में नेकी का शौक़ और तक़वा पैदा होता है, और हलाकशुदा बस्तियों को देखकर गुनाहों से ख़ौफ़ और तौबा का जज़्बा बेदार होता है।
काफ़िरों के पास ज़ाहिरी आंखें और कान तो थे, मगर वे हक़ को देखने और समझने से महरूम थे। हक़ीक़ी बसीरत दिल की बसीरत है, जो इन चीज़ों से हासिल होती है:
ज़िक्रे इलाही की कसरत
औलिया-ए-किराम की सोहबत
क़ुरआन मजीद की तिलावत और तदब्बुर
नमाज़े तहज्जुद और सुब्ह का इस्तिग़फ़ार
अस्ल अंधापन आंखों का नहीं बल्कि दिल का अंधापन है। जिसकी आंखें न हों मगर दिल रौशन हो, वह दुनिया व आख़िरत में कामयाब है; लेकिन जिसकी आंखें सलामत हों और दिल अंधा हो, वह खुली निशानियां देखकर भी गुमराह रहता है।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat