Transliteration: (Yaaa ayyuhan naasu in kuntum fee raibin minal ba'thi fa innaa khalaqnaakum min turaabin thumma min nutfatin thumma min 'alaqatin thumma min mudghatin mukhallaqatinw wa ghairi mukhallaqatin linubaiyina lakum; wa nuqirru fil arhaami maa nashaaa'u ilaaa ajalin musamman thumma nukhrijukum tiflan thumma litablughooo ashuddakum wa minkum mai yutawaffa wa minkum mai yuraddu ilaaa arzalil 'umuri likailaa ya'lama min ba'di 'ilmin shai'aa; wa taral arda haamidatan fa izaaa anzalnaa 'alaihal maaa'ah tazzat wa rabat wa ambatat min kulli zawjin baheej)
"ऐ लोगो [9]! अगर तुम्हें (मरने के बाद) दोबारा उठाए जाने के बारे में कोई शक है, तो (ग़ौर करो कि) हमने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया [10], फिर नुत्फ़े (बूंद) से, फिर जमे हुए ख़ून के लोथड़े से [11], फिर गोश्त की बोटी से जो बनावट वाली भी होती है और बे-बनावट भी [12], ताकि हम तुम्हारे लिए (अपनी कु़दरत) साफ़ ज़ाहिर कर दें [13]; और हम जिसे चाहते हैं एक मुक़र्रर वक़्त तक रहम (गर्भाशय) में ठहराए रखते हैं [14], फिर हम तुम्हें एक बच्चे की शक्ल में बाहर निकालते हैं [15], फिर ताकि तुम अपनी पूरी जवानी को पहुंचो [16]; और तुम में से कोई तो पहले ही वफ़ात पा जाता है [17] और कोई बदतरीन (कमज़ोर तरीन) उम्र की तरफ़ लौटा दिया जाता है [18] ताकि वह सब कुछ जानने के बाद कुछ भी न जाने [19]; और आप ज़मीन को देखते हैं कि सूखी बंजर पड़ी है, फिर जब हम उस पर पानी बरसाते हैं, तो वह ताज़ा होकर लहलहा उठती है और उभर आती है और हर तरह की दिलकश रौनक़दार नबातात उगाती है [20] ।"
अल्लाह तआला ने दोबारा ज़िन्दा किए जाने (हश्र) के इनकारियों को इंसानी पैदाइश के मराहिल पर ग़ौर करने की दावत दी:
मिट्टी [10]: हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तख़लीक़ मिट्टी से हुई जो तमाम इंसानियत की अस्ल है।
नुत्फ़ा व अलक़ा [11]: फिर नुत्फ़े से जमे हुए ख़ून का लोथड़ा बना।
मुज़ग़ा [12]: फिर गोश्त की बोटी, जिसमें से कुछ मुकम्मल इंसानी आज़ा की शक्ल इख़्तियार करती है और कुछ साक़ित हो जाती है। यह अल्लाह की हिकमत है ताकि अपनी अज़ीम क़ुदरत को ज़ाहिर फ़रमाए [13] ।
मां के पेट में मुक़र्रर मुद्दत (नौ माह) ठहरने के बाद [14] इंसान एक कमज़ोर बच्चा बनकर दुनिया में आता है [15] । फिर वह जवानी की कुव्वत तक पहुंचता है [16] । कोई जवानी ही में वफ़ात पा जाता है [17] और कोई बुढ़ापे की उस कमज़ोर तरीन उम्र को पहुंचता है जहाँ उसका इल्म और याददाश्त ख़त्म हो जाती है [18-19] । यह साबित करता है कि इंसान हर लम्हा अपने ख़ालिक़ का मोहताज है।
जिस तरह सूखी, मुर्दा ज़मीन बारिश का पानी पाते ही लहलहा उठती है और उसमें से तरह-तरह के ख़ूबसूरत दरख़्त और पौधे निकल आते हैं, ठीक उसी तरह अल्लाह तआला क़ियामत के दिन सूर फूंके जाने पर तमाम मुर्दों को ज़मीन से दोबारा ज़िन्दा करके उठा खड़ा करेगा।
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