कुरान - 22:60 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

60
۞ذَٰلِكَۖ وَمَنۡ عَاقَبَ بِمِثۡلِ مَا عُوقِبَ بِهِۦ ثُمَّ بُغِيَ عَلَيۡهِ لَيَنصُرَنَّهُ ٱللَّهُۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٞ

Transliteration: (Zaalika wa man 'aaqaba bimisli maa 'ooqiba bihee summa bughiya 'alaihi la yansurannahul laah; innal laaha la 'Afuwwun Ghafoor)

60. यह (हुक्म है); और जो शख़्स (ज़ुल्म का) उतना ही बदला ले जितना उस पर ज़्यादती की गई थी, फिर उस पर (दुबारा) ज़ुल्म किया जाए, तो अल्लाह ज़रूर उसकी मदद फ़रमाएगा; बेशक अल्लाह बड़ा मुआफ़ करने वाला, बड़ा बख़्शने वाला है [126] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 60 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 60 की तफ़सीर

"यह (हुक्म है); और जो शख़्स (ज़ुल्म का) उतना ही बदला ले जितना उस पर ज़्यादती की गई थी, फिर उस पर (दुबारा) ज़ुल्म किया जाए, तो अल्लाह ज़रूर उसकी मदद फ़रमाएगा; बेशक अल्लाह बड़ा मुआफ़ करने वाला, बड़ा बख़्शने वाला है [126] ।"

[126] बराबर का बदला और मज़लूम की नुसरत

यह आयत उस वाक़िए के बारे में नाज़िल हुई जब माहे मुहर्रम (जो हुर्मत वाला महीना था) में मुशरिकीन ने मुसलमानों पर अचानक हमला कर दिया। मुसलमानों ने अपने दिफ़ाअ में बराबर का मुक़ाबला किया। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि ज़ुल्म के बराबर बदला लेना जाइज़ है, और अगर ज़ालिम दोबारा ज़्यादती करेगा तो अल्लाह मज़लूम की ज़रूर मदद फ़रमाएगा। नीज़ यह भी तालीम दी कि बदला लेने के मुक़ाबले में माफ़ करना और सब्र करना अल्लाह के नज़दीक ज़्यादा पसंदीदा है।

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