कुरान - 22:73 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

73
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ضُرِبَ مَثَلٞ فَٱسۡتَمِعُواْ لَهُۥٓۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ تَدۡعُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَن يَخۡلُقُواْ ذُبَابٗا وَلَوِ ٱجۡتَمَعُواْ لَهُۥۖ وَإِن يَسۡلُبۡهُمُ ٱلذُّبَابُ شَيۡـٔٗا لَّا يَسۡتَنقِذُوهُ مِنۡهُۚ ضَعُفَ ٱلطَّالِبُ وَٱلۡمَطۡلُوبُ

Transliteration: (Yaaa ayyuhan naasu duriba masalun fastami'oo lah; innal lazeena tad'oona min doonil laahi lai yakhluqoo zubaabanw wa lawijtama'oo lahoo wa iny yaslub humuz zubaabu shai'an laa yastanqizoohu minh; da'ufat taalibu wal matloob)

73. ऐ लोगो! एक मिसाल बयान की जाती है, पस उसे ग़ौर से सुनो [148]: बेशक जिन लोगों को तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो, वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते चाहे वे सब के सब इसके लिए इकट्ठा ही क्यों न हो जाएं [149] ! और अगर मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए, तो वे उसे उससे छुड़ा भी नहीं सकते [150] ! कितना कमज़ोर है तलब करने वाला (पुजारी) और कितना कमज़ोर है वह जिससे तलब किया जाए (माबूद) [151] ! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 73 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 73 की तफ़सीर

"ऐ लोगो! एक मिसाल बयान की जाती है, पस उसे ग़ौर से सुनो [148]: बेशक जिन लोगों को तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो, वे एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते चाहे वे सब के सब इसके लिए इकट्ठा ही क्यों न हो जाएं [149] ! और अगर मक्खी उनसे कोई चीज़ छीन ले जाए, तो वे उसे उससे छुड़ा भी नहीं सकते [150] ! कितना कमज़ोर है तलब करने वाला (पुजारी) और कितना कमज़ोर है वह जिससे तलब किया जाए (माबूद) [151] !"

[148] क़ुरआनी मिसाल पर तदब्बुर की दावत

क़ुरआन मजीद को सिर्फ़ सुनना काफ़ी नहीं बल्कि उसके मानी और मफ़हूम पर ग़ौर करना लाज़िम है। अल्लाह तआला ने यहाँ मुशरिकीन के अक़ीदे के खोखलेपन को ज़ाहिर करने के लिए एक शानदार मिसाल बयान फ़रमाई।

[149] बुतों की मुकम्मल बे-बसी

मुशरिकीन जिन पत्थरों, बुतों और मूर्तियों की पूजा करते थे, वे सब मिलकर एक हक़ीर मक्खी भी नहीं बना सकते।

याद रहे कि इस आयत का ताअल्लुक़ पत्थरों के बुतों से है। इसे अम्बिया व औलिया पर चस्पां करना सख़्त गुमराहकुन है, क्योंकि अम्बिया-ए-किराम (जैसे हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के इज़्न से परिंदे बनाकर उड़ाये और मुर्दों को ज़िन्दा किया। यह आयत बे-जान माबूदों की नफ़ी करती है।

[150] मक्खी से अपनी चीज़ न छुड़ा सकना

मुशरिक अपने बुतों पर ज़ाफ़रान और शहद मलते थे। मक्खियां आकर वह शहद चाट ले जाती थीं और वे माबूद अपने चेहरे से मक्खी तक नहीं उड़ा सकते थे। जो अपने ऊपर बैठी मक्खी को न भगा सके, वह दूसरों की क्या मदद करेगा!

[151] तालिब व मतलूब दोनों की कमज़ोरी

पुजारी (तालिब) भी कमज़ोर और उसका बे-जान बुत (मतलूब) भी कमज़ोर। दोनों की बेबसी और ज़िल्लत ज़ाहिर है।

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