Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanur ka'oo wasjudoo wa'budoo Rabbakum waf'alul khaira la'allakum tuflihoon (make sajda))
"ऐ ईमान वालो! रुकूअ करो और सजदा करो [155] और अपने रब की इबादत करो और नेकी के काम करो [156] ताकि तुम फ़लाह (कामयाबी) पा जाओ। ۩ (सजदा)"
क़ुरआन मजीद में जहाँ रुकूअ के साथ सजदे का हुक्म आया है, वहाँ नमाज़ की अदायगी मुराद होती है। हनफ़ी मज़हब के नज़दीक इस आयत पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब नहीं है (क्योंकि यह नमाज़ का ज़िक्र है), जबकि शाफ़ई मज़हब के नज़दीक यहाँ सजदा-ए-तिलावत सुन्नत/वाजिब है।
'अपने रब की इबादत करो' से मुराद हुक़ूक़ुल्लाह हैं (नमाज़, रोज़ा, हज) और 'नेकी के काम करो' से मुराद हुक़ूक़ुल-इबाद हैं (अख़लाक़े हसना, सिला-रहमी, ग़रीबों की इमदाद)। इन दोनों की पाबंदी ही दुनिया व आख़िरत में हक़ीक़ी फ़लाह और नजात का ज़रिया है।
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