कुरान - 22:77 सूरह अल-हज् अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

77
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱرۡكَعُواْ وَٱسۡجُدُواْۤ وَٱعۡبُدُواْ رَبَّكُمۡ وَٱفۡعَلُواْ ٱلۡخَيۡرَ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ۩

Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanur ka'oo wasjudoo wa'budoo Rabbakum waf'alul khaira la'allakum tuflihoon (make sajda))

77. ऐ ईमान वालो! रुकूअ करो और सजदा करो [155] और अपने रब की इबादत करो और नेकी के काम करो [156] ताकि तुम फ़लाह (कामयाबी) पा जाओ। ۩ (सजदा) (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हज् आयत 77 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हज्ज — आयत 77 की तफ़सीर

"ऐ ईमान वालो! रुकूअ करो और सजदा करो [155] और अपने रब की इबादत करो और नेकी के काम करो [156] ताकि तुम फ़लाह (कामयाबी) पा जाओ। ۩ (सजदा)"

[155] नमाज़ में रुकूअ व सुजूद और सजदा-ए-तिलावत का हुक्म

क़ुरआन मजीद में जहाँ रुकूअ के साथ सजदे का हुक्म आया है, वहाँ नमाज़ की अदायगी मुराद होती है। हनफ़ी मज़हब के नज़दीक इस आयत पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब नहीं है (क्योंकि यह नमाज़ का ज़िक्र है), जबकि शाफ़ई मज़हब के नज़दीक यहाँ सजदा-ए-तिलावत सुन्नत/वाजिब है।

[156] हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूक़ुल-इबाद का इज्तिमाअ

'अपने रब की इबादत करो' से मुराद हुक़ूक़ुल्लाह हैं (नमाज़, रोज़ा, हज) और 'नेकी के काम करो' से मुराद हुक़ूक़ुल-इबाद हैं (अख़लाक़े हसना, सिला-रहमी, ग़रीबों की इमदाद)। इन दोनों की पाबंदी ही दुनिया व आख़िरत में हक़ीक़ी फ़लाह और नजात का ज़रिया है।

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