Transliteration: (Fa izaa sawwaituhoo wa nafakhtu feehi mir roohee faqa'oo lahoo saajideen)
"फिर जब मैं उसे ठीक कर लूँ और उसमें अपनी तरफ़ की ख़ास रूह फूँक दूँ [36], तो तुम उसके लिए सजदे में गिर पड़ना [37]।"
इससे मालूम हुआ कि यह सजदा सिर्फ़ हज़रत आदम की रूह के लिए नहीं बल्कि उनके नूरानी जिस्म के लिए भी था। वर्ना रूह फूँकने की क़ैद न लगाई जाती।
फ़रिश्तों का यह सजदा हज़रत आदम की शरीअत के अहकाम के तहत नहीं था, क्योंकि उस वक़्त शरीअत नाज़िल नहीं हुई थी; और शरीअत इन्सानों पर लागू होती है, फ़रिश्तों पर नहीं। इसके अलावा यह सजदा केवल एक बार के लिए मख़्सूस था और दोबारा इसका हुक्म नहीं हुआ। इसलिए किसी इन्सान के लिए ताज़ीमी सजदा करना जाइज़ नहीं है।
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