कुरान - 15:33 सूरह अल-हिज्र अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
قَالَ لَمۡ أَكُن لِّأَسۡجُدَ لِبَشَرٍ خَلَقۡتَهُۥ مِن صَلۡصَٰلٖ مِّنۡ حَمَإٖ مَّسۡنُونٖ

Transliteration: (Qaala lam akul li asjuda libasharin khalaqtahoo min salsaalim min hama im masnoon)

बोला, "मुझे ज़ेबा (शोभा) नहीं कि मैं एक बशर को सजदा करूँ जिसे तूने बजती हुई मिट्टी से बनाया जो सड़े काले गारे से थी [40]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हिज्र आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हिज्र – आयत 33 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

बोला, "मुझे ज़ेबा नहीं कि मैं एक बशर को सजदा करूँ जिसे तूने बजती हुई मिट्टी से बनाया जो सड़े काले गारे से थी [40]।"

[40] इब्लीस का इन्कार और ग़लत क़ियास

इससे चन्द अहम बातें मालूम हुईं:

  1. कायनात में सबसे पहले शैतान ने नबी को 'बशर' कहकर बराबरी का दावा किया था। अब जो कोई नबी को आम बशर कहकर बराबरी का दावा करे, वह शैतान के तरीक़े पर है।

  2. शैतान ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का ख़ाकी जिस्म देखा था, उनका नूर और रूह नहीं देखी थी। चुनाँचे जिसकी नज़र नबी की सिर्फ़ बशरी हालत पर रहे, उसका अंजाम भी शैतान जैसा होता है।

  3. हुक्म-ए-इलाही के मुक़ाबले में अपनी राय और अक़्ल लड़ाना शैतानी अमल है; क़तई हुक्म के ख़िलाफ़ क़ियास बातिल है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now