कुरान - 15:52 सूरह अल-हिज्र अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

52
إِذۡ دَخَلُواْ عَلَيۡهِ فَقَالُواْ سَلَٰمٗا قَالَ إِنَّا مِنكُمۡ وَجِلُونَ

Transliteration: (Iz dakhaloo 'alaihi faqaaloo salaaman qaala innaa minkum wajiloon)

जब वे उनके पास आए तो बोले, "सलाम" [60]; इब्राहीम ने कहा, "हमें तुमसे डर मालूम होता है" [61]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हिज्र आयत 52 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हिज्र – आयत 52 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

जब वे उनके पास आए तो बोले, "सलाम" [60]; इब्राहीम ने कहा, "हमें तुमसे डर मालूम होता है" [61]।

[60] मेहमान-नवाज़ी और सलाम के आदाब

इससे दो बातें मालूम हुईं:

  1. जो हमारे पास मिलने आए वह मेहमान है, चाहे उसे बुलाया गया हो या वह ख़ुद आया हो।

  2. आने वाले मुसाफ़िर का पहले सलाम करना सुन्नत है।

[61] ख़ौफ़ का सबब और अम्बिया की शान

मेहमानों का बे-वक़्त आना और खाना न खाना देखकर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अंदेशा हुआ, क्योंकि उस ज़माने में खाना न खाना दुश्मनी की अलामत समझा जाता था। इससे मालूम हुआ कि तबाही या नुक़सान का फ़ितरी डर (ख़ौफ़-ए-तबई) नुबुव्वत की शान के ख़िलाफ़ नहीं है — जैसे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने भी फ़िरऔन के सामने ख़ौफ़ महसूस किया था। अलबत्ता इताअत व फ़रमाँबरदारी के ऐतबार से नबी सिर्फ़ अल्लाह तआला से डरता है और किसी मख़लूक़ से नहीं डरता।

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