कुरान - 15:9 सूरह अल-हिज्र अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

9
إِنَّا نَحۡنُ نَزَّلۡنَا ٱلذِّكۡرَ وَإِنَّا لَهُۥ لَحَٰفِظُونَ

Transliteration: (Innaa Nahnu nazalnaz Zikra wa Innaa lahoo lahaa fizoon)

बेशक हमने उतारा है यह क़ुरआन [12] और बेशक हम ख़ुद इसके निगहबान हैं [13]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हिज्र आयत 9 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हिज्र – आयत 9 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

बेशक हमने उतारा है यह क़ुरआन [12] और बेशक हम ख़ुद इसके निगहबान हैं [13]।

[12] क़ुरआन का नुज़ूल और अज़मत

इससे चन्द अहम बातें मालूम हुईं:

  1. अरबी ज़बान में ताज़ीम व इज़्ज़त के तौर पर वाहिद (एकवचन) के लिए जमा (बहुवचन — 'हमने') का सेग़ा इस्तेमाल होता है।

  2. मक़बूल बन्दों के कामों को अल्लाह तआला अपना काम फ़रमाता है। मिसाल के तौर पर क़ुरआन का लाना फ़रिश्तों का काम है, लेकिन अल्लाह तआला फ़रमाता है: "हमने उतारा"।

  3. लौह-ए-महफ़ूज़ ऊपर है, नीचे नहीं; क्योंकि नुज़ूल (उतरना) ऊपर से नीचे की तरफ़ होता है। बुज़ुर्गान-ए-दीन और सूफ़ी फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ही मोमिन के दिल में क़ुरआन को उतारता है, और वही उसकी हिफ़ाज़त फ़रमाता है ताकि उसका ख़ातिमा ईमान पर हो।

[13] क़ुरआन-ए-पाक की मुकम्मल हिफ़ाज़त

अल्लाह तआला ने क़ुरआन-ए-पाक के अलफ़ाज़, उसके मआनी (अर्थ) और उसके अहकाम सब की हिफ़ाज़त फ़रमाई है। अलफ़ाज़ की हिफ़ाज़त इस तरह कि इसमें रद्दोबदल मुमकिन ही नहीं; और मआनी व अहकाम की हिफ़ाज़त इस तरह कि अगरचे कुछ लोग इसमें तहरीफ़ या ग़लत तावील की कोशिश करें, मगर अस्ल अहकाम महफ़ूज़ रहते हैं और हमेशा क़ायम रहेंगे।

इसी मक़सद के लिए अल्लाह तआला ने हुज़ूर अकरम ﷺ की हदीसों को क़यामत तक बाक़ी रखा और उलमा व औलिया के सिलसिले को जारी फ़रमाया।

इससे मालूम हुआ कि हदीस-ए-रसूल ﷺ क़ुरआन-ए-पाक के हक़ीक़ी मफ़हूम की हिफ़ाज़त का सबसे बड़ा ज़रिया है।

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