कुरान - 3:102 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

102
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱتَّقُواْ ٱللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِۦ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنتُم مُّسۡلِمُونَ

Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanut taqul laaha haqqa tuqaatihee wa laa tamootunna illaa wa antum muslimoon)

ऐ ईमान लाने वालों! अल्लाह से ऐसा डर रखो जैसा कि उससे डरने का हक़ है [226], और तुम मरो तो सिर्फ़ इस्लाम की हालत में [227]. (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 102 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 102 की तफ़्सीर

 

✅ [226] अल्लाह से डरना — जैसे डरने का हक़ है

इस आयत में तक़वा की जो माँग की गई है, वह बहुत गहरी है: अल्लाह से वैसा डरना जैसा कि उससे डरने का हक़ है। इसका अर्थ यह नहीं कि इंसान असंभव स्तर तक पहुँचे, बल्कि इसकी व्याख्या सूरा अत-तग़ाबुन (आयत 16) से होती है: "अल्लाह से डरों अपनी क्षमता के अनुसार"। इसका मतलब है कि यह हुक्म रद्द नहीं है, बल्कि हमेशा लागू रहने वाला उसूल है। इस आयत से यह सिखाया गया है कि हर मोमिन को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार तक़वा की कोशिश करनी चाहिए, और अल्लाह इंसान के प्रयास और सामर्थ्य के अनुसार उसका हिसाब करता है।

✅ [227] इस्लाम की हालत में मौत

यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु इस्लाम पर हो। अगर कोई व्यक्ति पूरी उम्र मोमिन रहा लेकिन आख़िर में कुफ़्र की हालत में मर गया, तो उसका अंजाम एक सच्चे काफिर जैसा होगा। यह आयत बताती है कि इमान की हिफ़ाज़त ज़िंदगी भर करनी है, और हर वक़्त इस बात की फिक्र होनी चाहिए कि अंत भी उसी इमान के साथ हो। इसलिए मोमिन को चाहिए कि हमेशा सजग और चौकन्ना रहे, और अल्लाह की आज्ञा में मरने की दुआ करता रहे।

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