Transliteration: (Yaaa ayyuhal lazeena aamanut taqul laaha haqqa tuqaatihee wa laa tamootunna illaa wa antum muslimoon)
इस आयत में तक़वा की जो माँग की गई है, वह बहुत गहरी है: अल्लाह से वैसा डरना जैसा कि उससे डरने का हक़ है। इसका अर्थ यह नहीं कि इंसान असंभव स्तर तक पहुँचे, बल्कि इसकी व्याख्या सूरा अत-तग़ाबुन (आयत 16) से होती है: "अल्लाह से डरों अपनी क्षमता के अनुसार"। इसका मतलब है कि यह हुक्म रद्द नहीं है, बल्कि हमेशा लागू रहने वाला उसूल है। इस आयत से यह सिखाया गया है कि हर मोमिन को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार तक़वा की कोशिश करनी चाहिए, और अल्लाह इंसान के प्रयास और सामर्थ्य के अनुसार उसका हिसाब करता है।
यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु इस्लाम पर हो। अगर कोई व्यक्ति पूरी उम्र मोमिन रहा लेकिन आख़िर में कुफ़्र की हालत में मर गया, तो उसका अंजाम एक सच्चे काफिर जैसा होगा। यह आयत बताती है कि इमान की हिफ़ाज़त ज़िंदगी भर करनी है, और हर वक़्त इस बात की फिक्र होनी चाहिए कि अंत भी उसी इमान के साथ हो। इसलिए मोमिन को चाहिए कि हमेशा सजग और चौकन्ना रहे, और अल्लाह की आज्ञा में मरने की दुआ करता रहे।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat