कुरान - 3:104 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

104
وَلۡتَكُن مِّنكُمۡ أُمَّةٞ يَدۡعُونَ إِلَى ٱلۡخَيۡرِ وَيَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِۚ وَأُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ

Transliteration: (Waltakum minkum ummatuny yad'oona ilal khairi wa ya'muroona bil ma'roofi wa yanhawna 'anil munkar; wa ulaaa'ika humul muflihoon)

और तुममें से एक ऐसा गिरोह होना चाहिए जो भलाई की ओर बुलाए [233], नेकी का हुक्म दे और बुराई से रोके। वही लोग हैं जो सफल होंगे [234]. (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 104 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 104 की तफ़्सीर

 

✅ [233] दीनी इल्म का फ़र्ज़-ए-किफाया

इस आयत से यह साबित होता है कि दीनी इल्म सीखना फ़र्ज़-ए-किफाया है — यानी हर व्यक्ति पर अनिवार्य नहीं, लेकिन हर क्षेत्र में कम से कम एक योग्य आलिम का होना ज़रूरी है। अगर ऐसा हो जाए, तो बाक़ियों से यह ज़िम्मेदारी उतर जाती है। साथ ही, इस आयत से यह भी स्पष्ट होता है कि दीनी मामलों में एक योग्य आलिम की राय ही काफ़ी और क़ाबिल-ए-क़बूल होती है। इसके अलावा, एक आलिम पर यह भी अनिवार्य है कि वह इस्लाम की दावत को ज़बान और अमल दोनों से फैलाए।

✅ [234] असली कामयाबी — दावत के ज़रिए

"वही लोग हैं जो सफल होंगे" — इससे मुराद वो आलिम और दाई हैं जो भलाई की दावत देते हैं, नेकी का हुक्म देते हैं, और बुराई से रोकते हैं। इससे यह पता चलता है कि एक आलिम जो दावत का काम करता है, वही सच्चे मायनों में कामयाब है। इस्लाम की दावत को अल्लाह की राह में सबसे बड़ा जिहाद माना गया है। जिस तरह क़ुरआन तलवार के सही इस्तेमाल की हिदायत देता है, वैसे ही तलवार का उद्देश्य भी रास्ते की रुकावटें हटाकर दावत-ए-हक़ को आसान बनाना है।

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