Transliteration: (Yawma tabi yaddu wujoohunw wa taswaddu wujooh; fa-ammal lazeenas waddat wujoo hum akafartum ba'da eemaanikum fazooqul 'azaaba bimaa kuntum takfuroon)
इस आयत से हमें मालूम होता है कि क़यामत के दिन मोमिन और काफ़िर के बीच फर्क उनके चेहरों से ही साफ़ नज़र आ जाएगा, और किसी पूछताछ की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। चमकते चेहरे मोमिनों के होंगे, जबकि काले चेहरे काफ़िरों और मुनाफ़िकों के। इसी रौशनी में रसूलुल्लाह ﷺ का वह कौल भी समझ में आता है जो हौज़-ए-कौसर पर मर्तदीन के बारे में है, कि "ये मेरे साथी हैं" — यह बात न पहचान की कमी से नहीं, बल्कि तंज और इलाही नाराज़गी के अंदाज़ में कही गई है। क़ुरआन में भी दोज़ख़ियों को इसी तरह तंज़िया लहजे में कहा गया है: "चखो, हाँ ज़रूर, तुम तो बड़े इज़्ज़तदार और नेक थे" (सूरा अद-दुख़ान, आयत 49)। इसलिए, रसूल का यह कथन भी ताबीर के तौर पर नाराज़गी ही का इज़हार है, न कि तस्लीम या तारीफ़।
इस आयत में चेतावनी उन लोगों को दी गई है जिन्होंने ईमान लाने के बाद उससे फिर मुख मोड़ लिया — चाहे आलम-ए-अरवाह में रब को मानने के बाद, या ज़ाहिरी तौर पर इस्लाम क़बूल करके बाद में इनकार करने वालों को, या फिर जो अंदर से मुनाफ़िक़ थे। इसलिए, यह इलाही तंज और सज़ा का ऐलान काफ़िरों, मुनाफ़िक़ों और मर्तदीन — तीनों पर लागू होता है। "तो अब चखो सज़ा" — यह बात साबित करती है कि उन्होंने जानबूझकर हिदायत के बाद गुमराही को चुना, इसलिए उनकी सज़ा जायज़ और सख़्त होगी।
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