कुरान - 3:105 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

105
وَلَا تَكُونُواْ كَٱلَّذِينَ تَفَرَّقُواْ وَٱخۡتَلَفُواْ مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلۡبَيِّنَٰتُۚ وَأُوْلَـٰٓئِكَ لَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٞ

Transliteration: (Wa laa takoonoo kallazeena tafarraqoo wakhtalafoo mim ba'di maa jaaa'ahumul baiyinaat; wa ulaaa'ika lahum 'azaabun 'azeem)

और उन लोगों की तरह न हो जाना जिन्होंने अपने पास स्पष्ट प्रमाण आने के बाद आपस में फिरक़ों में बँटकर मतभेद किया [235]। ऐसे ही लोग हैं जिनके लिए बड़ा अज़ाब है [236]. (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 105 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 105 की तफ़्सीर

 

✅ [235] फ़िरक़ाबंदी का असली कारण

इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि असली गुनहगार वो व्यक्ति है जो इस्लाम के रास्ते से हटकर उसमें नई और गैर-शरई बातें शामिल करता है, और इसी से उम्मत में फूट और फ़िरक़ाबंदी पैदा होती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति इस्लाम की मूल शिक्षाओं पर क़ायम रहता है, वह किसी तफ़रक़े का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "जो मुसलमानों के रास्ते के अलावा किसी और रास्ते की पैरवी करे, तो हम उसे उसी रास्ते पर छोड़ देंगे" (सूरा अन-निसा, आयत 115)। इसलिए, अहले सुन्नत की राह पर चलने वाले हक़ पर हैं, और वो तमाम फ़िरक़े जो इसमें नई बातों की मिलावट करते हैं, तफ़रक़े के ज़िम्मेदार हैं।

✅ [236] इल्म वालों की गुमराही का ख़तरा

इस आयत से यह सिखाया गया है कि एक आलिम की गुमराही, जाहिल से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक होती है। क्योंकि एक आलिम अगर राह से भटके, तो वो पूरे समाज को गुमराह कर सकता है। इसीलिए आयत में कहा गया: "जब उनके पास स्पष्ट हिदायतें आ चुकी थीं" — यानी, जानबूझकर गुमराह होना और हक़ जानने के बावजूद उसे छोड़ना, ज़्यादा संगीन और सज़ा का कारण बनता है। इल्म के बाद की गुमराही, सबसे ज़्यादा लानत और अज़ाब वाली होती है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now