Transliteration: (Wa laa takoonoo kallazeena tafarraqoo wakhtalafoo mim ba'di maa jaaa'ahumul baiyinaat; wa ulaaa'ika lahum 'azaabun 'azeem)
इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि असली गुनहगार वो व्यक्ति है जो इस्लाम के रास्ते से हटकर उसमें नई और गैर-शरई बातें शामिल करता है, और इसी से उम्मत में फूट और फ़िरक़ाबंदी पैदा होती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति इस्लाम की मूल शिक्षाओं पर क़ायम रहता है, वह किसी तफ़रक़े का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अल्लाह तआला फ़रमाता है: "जो मुसलमानों के रास्ते के अलावा किसी और रास्ते की पैरवी करे, तो हम उसे उसी रास्ते पर छोड़ देंगे" (सूरा अन-निसा, आयत 115)। इसलिए, अहले सुन्नत की राह पर चलने वाले हक़ पर हैं, और वो तमाम फ़िरक़े जो इसमें नई बातों की मिलावट करते हैं, तफ़रक़े के ज़िम्मेदार हैं।
इस आयत से यह सिखाया गया है कि एक आलिम की गुमराही, जाहिल से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक होती है। क्योंकि एक आलिम अगर राह से भटके, तो वो पूरे समाज को गुमराह कर सकता है। इसीलिए आयत में कहा गया: "जब उनके पास स्पष्ट हिदायतें आ चुकी थीं" — यानी, जानबूझकर गुमराह होना और हक़ जानने के बावजूद उसे छोड़ना, ज़्यादा संगीन और सज़ा का कारण बनता है। इल्म के बाद की गुमराही, सबसे ज़्यादा लानत और अज़ाब वाली होती है।
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