Transliteration: (Wallazeena izaa fa'aloo faahishatan aw zalamooo anfusahum zakarul laaha fastaghfaroo lizunoobihim; wa mai yaghfiruz zunooba illal laahu wa lam yusirroo 'alaa maa fa'aloo wa hum ya'lamoon)
इस्लाम में अश्लीलता उन गुनाहों को कहा गया है जिन पर खुलकर सज़ा तय है — जैसे ज़िना (व्यभिचार) या चोरी। इसके बरअक्स, ज़ुल्म करना उन गुनाहों को दर्शाता है जिनकी सज़ा साफ़ तौर पर तय नहीं — जैसे नमाज़ छोड़ना। अश्लीलता अक्सर दूसरों को नुक़सान पहुंचाने वाले बड़े गुनाह होते हैं, जबकि ज़ुल्म छोटे गुनाह हो सकते हैं जो दूसरों को सीधे प्रभावित नहीं करते। हर किस्म के गुनाह के लिए तौबा ज़रूरी है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा।
यह आयत हर गुनहगार को माफ़ी की उम्मीद देती है। जिस तरह नेक लोग अल्लाह के बंदे हैं, उसी तरह गुनाहगार भी अल्लाह के बंदे हैं। अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा हर किसी के लिए खुला है। इंसान दूसरों के हक़ माफ़ कर सकता है, लेकिन हक़ीक़ी माफ़ी सिर्फ़ अल्लाह ही देता है। इसलिए कभी भी अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए, चाहे गुनाह कितना भी बड़ा क्यों न हो।
यह सीख मिलती है कि छोटे गुनाह अगर बार-बार किए जाएं तो वे बड़े गुनाहों की तरफ़ ले जा सकते हैं। साथ ही, अगर इंसान अपनी गलती पर अड़ जाए, तो सच्ची तौबा की तौफ़ीक़ उससे छिन सकती है। तौबा तभी क़बूल होती है जब दिल से पछतावा हो और आगे ना दोहराने का इरादा पक्का हो।
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