कुरान - 3:23 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

23
أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ أُوتُواْ نَصِيبٗا مِّنَ ٱلۡكِتَٰبِ يُدۡعَوۡنَ إِلَىٰ كِتَٰبِ ٱللَّهِ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَهُمۡ ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٞ مِّنۡهُمۡ وَهُم مُّعۡرِضُونَ

अनुवाद -

23. "क्या तुमने नहीं देखा (ऐ मुहम्मद ﷺ) उन लोगों को जिन्हें किताब का एक हिस्सा दिया गया था? उन्हें अल्लाह की किताब की तरफ़ बुलाया जाता है [50] ताकि वो उनके बीच फ़ैसला करे, लेकिन उनमें से एक गिरोह मुँह फेर लेता है और (मानने से) इनकार कर देता है।"

सूरह आल-इमरान आयत 23 तफ़सीर


[50] अल्लाह की किताब की तरफ़ बुलाया जाता है

👉 इस हिस्से में बताया गया कि यहूदियों को अल्लाह की किताब — यानी तौरात की तरफ़ बुलाया गया, ताकि उसके हुक्म से उनके आपसी झगड़े का फ़ैसला किया जाए।

लेकिन उन्होंने उस दावत को क़ुबूल नहीं किया, क्योंकि:

  • एक मौके पर जब पैग़ंबर ﷺ ने उन्हें बताया कि वो हज़रत इब्राहीम (अ.स.) के असल दीन को मानते हैं, तो यहूदियों ने झूठा दावा किया कि इब्राहीम यहूदी थे।
  • रसूल ﷺ ने कहा: "तौरात लाओ और दिखाओ अगर सच कहते हो।" लेकिन उन्होंने लाने से इनकार कर दिया

एक और वाक़िआ ये था कि:

  • एक यहूदी अमीर ने ज़िना किया। लोग रसूल ﷺ के पास हल्का हुक्म लेने आए।
  • रसूल ﷺ ने कहा: "तौरात का हुक्म क्या है?"
    यहूदी आलिम इब्न सूरया ने पत्थर से मारने की सज़ा वाली आयत को उंगली से छिपा दिया।
  • अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ि.) ने हक़ को उजागर किया।
  • नतीजा: असली सज़ा दी गई।

📌 सबक़: जो लोग दीन के हुक्म को छिपाते हैं या बदलते हैं, वो सच्चाई से भागते हैं। अल्लाह का हुक्म हर हाल में मानना ज़रूरी है।

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