कुरान - 3:24 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

24
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ قَالُواْ لَن تَمَسَّنَا ٱلنَّارُ إِلَّآ أَيَّامٗا مَّعۡدُودَٰتٖۖ وَغَرَّهُمۡ فِي دِينِهِم مَّا كَانُواْ يَفۡتَرُونَ

Transliteration: (Zaalika bi annahum qaaloo lan tamassanan naaru illaaa ayyaamam ma'doodaatinw wa gharrahum fee deenihim maa kaanoo yaftaroon)

24. "यह इसलिए है क्योंकि वे कहते हैं: 'हमें तो आग कभी छू ही नहीं सकती, सिवाए गिने-चुने दिनों के [51]।' और उनके झूठ ने उन्हें उनके अपने दीन के बारे में धोखे में डाल दिया [52]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 24 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[51] "हमें तो आग कभी छू ही नहीं सकती..." — झूठे दावे

👉 यहाँ बताया गया है कि यहूदी लोग सोचते थे कि चाहे वे कितने भी गुनाह करें, जहन्नम की आग उन्हें सिर्फ़ कुछ ही दिन छुएगी। यह उनके ग़लत विश्वास की वजह थी।
वे ये मानते थे कि वे अल्लाह के खास बंदे हैं इसलिए उनकी सज़ा कम होगी।

[52] "और उनके झूठ ने उन्हें धोखे में डाल दिया..."

👉 उनका यह झूठा भरोसा और आराम-ए-दिल उन्हें अपने दीन की सच्चाई से दूर कर रहा था।
इन्हें ये एहसास ही नहीं था कि असली दीन में खौफ़ और उम्मीद दोनों का होना ज़रूरी है।

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