कुरान - 3:25 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

25
فَكَيۡفَ إِذَا جَمَعۡنَٰهُمۡ لِيَوۡمٖ لَّا رَيۡبَ فِيهِ وَوُفِّيَتۡ كُلُّ نَفۡسٖ مَّا كَسَبَتۡ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ

Transliteration: (Fakaifa izaa jama'naahum li Yawmil laa raiba fee wa wuffiyat kullu nafsim maa kasabat wa hum laa yuzlamoon)

25. "तो फिर क्या होगा जब हम उन्हें उस दिन इकठ्ठा करेंगे जिस दिन कोई शक़ नहीं होगा? हर आत्मा को पूरा-पूरी उसका दिया जाएगा जो उसने कमाया है [53], और उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 25 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

[53] "हर आत्मा को पूरा-पूरी उसका दिया जाएगा..." — न्याय और हिसाब

👉 इस आयत में आख़िरत के दिन के न्याय का ज़िक्र है।

  • हर इंसान को उसका पूरा हिसाब दिया जाएगा — न कोई कमी, न कोई ज़्यादा।
  • जो भी उसने किया, उसका बदला बिल्कुल बराबर मिलेगा।
  • अगर उसने अच्छे काम किए, तो उन्हें कम नहीं किया जाएगा।
  • अगर उसने गुनाह किए, तो सज़ा उसके हक़ के मुताबिक़ होगी — ज़्यादा नहीं।

⚠️ साथ ही, अल्लाह की रहमत से अच्छे कामों को बढ़ा भी दिया जा सकता है, और गुनाहों को माफ़ या कम भी किया जा सकता है।

📌 सबक़:
अल्लाह का न्याय बिल्कुल सही और पूरा है, मगर वह बहुत ही दयालु और रहम करने वाला भी है।
इसलिए इंसान को हमेशा अच्छा करने की कोशिश करनी चाहिए और अपने गुनाहों से तौबा (पश्चाताप) करनी चाहिए।

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