Transliteration: (Min qablu hudal linnaasi wa anzalal Furqaan; innallazeena kafaroo bi Aayaatil laahi lahum 'azaabun shadeed; wallaahu 'azeezun zun tiqaam)
✅ [3] पैग़म्बर और वह किताब जो अंतिम है
यह आयत इस बात को स्थापित करती है कि इसके बाद कोई और दिव्य किताब नहीं आएगी और कोई नया पैग़म्बर नहीं आएगा। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का मिशन पहले की किताबों की सत्यता की पुष्टि करना था, न कि कोई नया पैग़म्बर या किताब लाना। कुरआन ने पुराने धर्मग्रंथों (जैसे तोराह और इन्जील) की सत्यता को प्रमाणित किया और उनकी भविष्यवाणियों को पूरा किया।
🟢 महत्वपूर्ण बिंदु: ये पुराने ग्रंथ कुरआन के आने की भविष्यवाणी करते थे, और उनकी प्रमाणिकता केवल कुरआन के नाज़िल होने के बाद स्थापित हुई। बिना कुरआन के, ये भविष्यवाणियाँ साबित नहीं हो पातीं।
✅ [4] फ़रक (Criterion): सत्य और असत्य का अंतर
“उसने फ़रक दिया” के दो मतलब हो सकते हैं:
यह आयत कुरआन की अन्य आयतों के साथ पूरी तरह मेल खाती है।
✅ [5] नज़रान की ईसाई प्रतिनिधिमंडल का इनकार
यहाँ जिन लोगों का जिक्र है, वे नज़रान के ईसाई प्रतिनिधि थे, जो पैग़म्बर ﷺ से बहस कर रहे थे। “अल्लाह की आयतें” से मतलब उनके पैग़म्बर ﷺ के स्पष्ट तर्कों और भाषणों से है। उन्होंने सिद्ध किया कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के बंदे हैं, न कि भगवान या उसके पुत्र। उनका इनकार इस आयत में “अल्लाह के आयात का इनकार” कहलाता है, जिसके कारण कड़ी सज़ा तय की गई है।
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