कुरान - 3:7 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

7
هُوَ ٱلَّذِيٓ أَنزَلَ عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ مِنۡهُ ءَايَٰتٞ مُّحۡكَمَٰتٌ هُنَّ أُمُّ ٱلۡكِتَٰبِ وَأُخَرُ مُتَشَٰبِهَٰتٞۖ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمۡ زَيۡغٞ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَٰبَهَ مِنۡهُ ٱبۡتِغَآءَ ٱلۡفِتۡنَةِ وَٱبۡتِغَآءَ تَأۡوِيلِهِۦۖ وَمَا يَعۡلَمُ تَأۡوِيلَهُۥٓ إِلَّا ٱللَّهُۗ وَٱلرَّـٰسِخُونَ فِي ٱلۡعِلۡمِ يَقُولُونَ ءَامَنَّا بِهِۦ كُلّٞ مِّنۡ عِندِ رَبِّنَاۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّآ أُوْلُواْ ٱلۡأَلۡبَٰبِ

Transliteration: (Huwal lazeee anzala 'alaikal Kitaaba minhu Aayaatum Muh kamaatun hunna Ummul Kitaabi wa ukharu Mutashaabihaatun fa'ammal lazeena fee quloobihim zaiyghun fa yattabi'oona ma tashaabaha minhubtighaaa 'alfitnati wabtighaaa'a taaweelih; wa maa ya'lamu taaweelahooo illal laah; warraasikhoona fil 'ilmi yaqooloona aamannaa bihee kullum min 'indi Rabbinaa; wa maa yazzakkaru illaaa ulul albaab)

7. वही है जिसने आप पर यह किताब उतारी। इसमें कुछ आयतें स्पष्ट अर्थ वाली हैं — वे किताब का मूल आधार हैं [8] — और कुछ ऐसी हैं जिनके अर्थ में संदेह है [9]। तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ापन है, वे उन्हीं संदेहयुक्त आयतों के पीछे चलते हैं, फितना फैलाने और अपनी मनमानी तफ़्सीर करने की नीयत से, जबकि उनका सही अर्थ [10] अल्लाह ही जानता है [11]। और जो लोग ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं: “हम तो उस पर ईमान लाए; यह सब हमारे रब की ओर से है” [12]। और यह बात कोई नहीं समझता सिवाय उनके जो गहराई से सोचते हैं [13]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 7 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

✅ [8] स्पष्ट आयतें: शरीअत का मूल आधार
यह वे आयतें हैं जो पूर्णतः स्पष्ट और बिना किसी संदेह के होती हैं। इन्हीं पर इस्लामी क़ानून, विश्वास और आचार आधारित होते हैं।

✅ [9] संदिग्ध अर्थ वाली आयतें
इनमें वे आयतें आती हैं जिनका मतलब स्पष्ट नहीं होता — जैसे मुक़त्तआत (अलग-अलग अक्षर जैसे अलिफ-लाम-मीम) या वे आयतें जो अल्लाह के गुणों का रूपक (metaphorical) विवरण देती हैं।

✅ [10] संदिग्ध आयतों का दुरुपयोग हराम है
जिनके दिलों में विकृति होती है, वे इन्हें गलत तरीके से व्याख्यायित करते हैं, जिससे भ्रम और फितना फैलता है।

✅ [11] सही ताफ़्सीर अल्लाह और उसके रसूल के पास है
हालाँकि सही मतलब सिर्फ़ अल्लाह जानता है, लेकिन यह भी हक़ है कि अल्लाह ने अपने प्यारे नबी ﷺ को इन आयतों की समझ दी। नबी ﷺ ने जिनको चाहा, उन तक यह ज्ञान पहुँचा।

✅ [12] सब पर ईमान लाना आवश्यक है
वास्तविक ज्ञानी व्यक्ति वही है जो कहता है: "हम सब आयतों पर ईमान लाते हैं — चाहे हम समझें या नहीं।" यह पूर्ण समर्पण की निशानी है।

✅ [13] जिनमें सूझबूझ है, वही इस बात को समझते हैं
यह आखिरी वाक्य संकेत देता है कि केवल वे ही इस गूढ़ ज्ञान को ग्रहण करते हैं जो विचारशील, विनम्र और ईमानदार हैं — न कि दुराग्रही या घमंडी।

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