कुरान - 3:78 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

78
وَإِنَّ مِنۡهُمۡ لَفَرِيقٗا يَلۡوُۥنَ أَلۡسِنَتَهُم بِٱلۡكِتَٰبِ لِتَحۡسَبُوهُ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَمَا هُوَ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ وَمَا هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِۖ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa inna minhum lafaree qany yalwoona alsinatahum bil Kitaabi litahsaboohu minal Kitaab, wa maa huwa minal Kitaabi wa yaqooloona huwa min 'indillaahi wa maa huwa min 'indillaahi wa yaqooloona 'alal laahil kaziba wa hum ya'lamoon)

और उनमें कुछ लोग ऐसे हैं जो किताब को पढ़ते हुए अपनी ज़बान को मरोड़ते हैं [166], ताकि तुम समझो कि वह किताब में से है [167], जबकि वह किताब में से नहीं है। और वे कहते हैं: यह अल्लाह की तरफ़ से है, हालाँकि वह अल्लाह की तरफ़ से नहीं है। और वे अल्लाह पर जानबूझ कर झूठ बाँधते हैं [168]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 78 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा आले-इमरान – आयत 78 की तफ़्सीर

✅ [166] ज़बान मरोड़कर किताब का भ्रम पैदा करना

यह उन लोगों की बात है जो बनावटी बातों को इस तरह पढ़ते थे कि वह तौरात की आयतें मालूम हों, ताकि लोगों को धोखा देकर गुमराह किया जा सके। इससे यह शिक्षा मिलती है कि ग़ैर-क़ुरआनी चीज़ों को क़ुरआन जैसा पढ़ना या पेश करना गलत है।

✅ [167] क़ुरआन की नकल करना हराम है

ऐसी किसी भी चीज़ को इस अंदाज़ में लिखना या पढ़ना कि वह क़ुरआन का हिस्सा लगे, सख्त मना है। अरबी शरहों (व्याख्याओं) में क़ुरआनी और ग़ैर-क़ुरआनी बातों में साफ़ फ़र्क़ किया जाता है, ताकि कोई भ्रम न हो।

✅ [168] जानबूझ कर झूठ बोलने का बड़ा गुनाह

जो लोग अल्लाह पर जानबूझ कर झूठ बाँधते हैं, उनका गुनाह उन लोगों से कहीं ज़्यादा है जो अज्ञानता में ऐसा करते हैं। क़ुरआन बार-बार बताता है कि वे लोग सच्चाई जानते थे, फिर भी उसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया।

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