कुरान - 3:97 सूरह आल-इमरान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

97
فِيهِ ءَايَٰتُۢ بَيِّنَٰتٞ مَّقَامُ إِبۡرَٰهِيمَۖ وَمَن دَخَلَهُۥ كَانَ ءَامِنٗاۗ وَلِلَّهِ عَلَى ٱلنَّاسِ حِجُّ ٱلۡبَيۡتِ مَنِ ٱسۡتَطَاعَ إِلَيۡهِ سَبِيلٗاۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ ٱللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ ٱلۡعَٰلَمِينَ

Transliteration: (Feehi Aayaatum baiyinaatum Maqaamu Ibraaheema wa man dakhalahoo kaana aaminaa; wa lillaahi 'alan naasi Hijjul Baiti manis tataa'a ilaihi sabeelaa; wa man kafara fa innal laaha ghaniyyun 'anil 'aalameen)

उसमें खुली निशानियां हैं जिनमें मक़ामे इब्राहीम है; और जो कोई उसमें दाख़िल हुआ वह अमन वाला हो गया; और लोगों पर अल्लाह के लिए उस घर का हज करना फ़र्ज़ है जो उस तक रास्ते की इस्तेअदाद रखता हो; और जो कोई कुफ़्र (इनकार) करे, तो बेशक अल्लाह तमाम जहानों से बे-नियाज़ है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह आल-इमरान आयत 97 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह आले इमरान - आयत 97

✅ मक़ामे इब्राहीम, हरम का अमन और हज की फ़र्ज़ियत

काबा में मक़ामे इब्राहीम जैसे वाज़ेह मोजिज़ात हैं। हरमे मक्का अमन का गहवारा है और साहिबे इस्तेताअत मुसलमानों पर ज़िंदगी में एक बार हज करना फ़र्ज़े ऐन है।

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