Transliteration: (Wa qadaa Rabbuka allaa ta'budooo illaaa iyyaahu wa bilwaalidaini ihsaanaa; immaa yablughanna 'indakal kibara ahaduhumaaa aw kilaahumaa falaa taqul lahumaaa uffinw wa laa tanharhumaa wa qullahumaa qawlan kareemaa)
"और आपके रब ने हुक्म फ़रमा दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो [57], और माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक़ करो। अगर तेरे सामने उन में से एक या दोनों बुढ़ापे को पहुँच जाएँ [58], तो उनसे 'उफ़' तक न कहना [59] और न उन्हें झिड़कना, और उनसे ताज़ीम भरी नेक बात कहना [60]।"
इससे चन्द अहम मसाइल साबित होते हैं:
अल्लाह तआला की इबादत हर मख़्लूक़ की वफ़ादारी पर मुक़द्दम है। याद रहे कि हुज़ूर अकरम ﷺ की इताअत व फ़रमाँबरदारी अल्लाह तआला ही की इबादत में दाख़िल है।
तमाम रिश्तेदारों में माँ-बाप की फ़रमाँबरदारी और ख़िदमत सबसे पहले है, क्योंकि अल्लाह तआला ने इसका ज़िक्र अपनी इबादत के साथ मिलाकर फ़रमाया है।
अगरचे माँ-बाप काफ़िर (ग़ैर-मुस्लिम) भी हों, तब भी उनके दुनियावी हुक़ूक़ अदा करना फ़र्ज़ है, क्योंकि अल्लाह तआला ने वालिदैन का ज़िक्र बिना किसी शर्त या क़ैद के मुतलक़ फ़रमाया है।
माँ-बाप की ख़िदमत जिस्मानी और माली दोनों तरह से करनी चाहिए, क्योंकि उनके साथ एहसान (भलाई) करने का हुक्म बिना किसी हदबंदी के आम रखा गया है।
इबादत अल्लाह तआला के सिवा किसी के लिए जाइज़ नहीं, जबकि इताअत अल्लाह तआला और उसके महबूब रसूल ﷺ के लिए है।
अगरचे माँ-बाप की ख़िदमत हर वक़्त ज़रूरी है, मगर उनकी ज़रूरत और बुढ़ापे की कमज़ोरी के वक़्त यह क़तई फ़र्ज़ हो जाती है।
जब वे मोहताज न हों तो उनकी ख़िदमत करना मुस्तहब (पसंदीदा) है, लेकिन जब वे बीमार, बूढ़े या लाचार हों, तो उनकी ख़िदमत करना फ़र्ज़ और लाज़िम हो जाता है।
शरई मसला:
माँ-बाप को कभी ऐसे अलफ़ाज़ न सुनने पड़ें जिनसे उन्हें यह लगे कि औलाद के बर्ताव ने उनकी ज़िन्दगी तंग कर दी है।
अपने माँ-बाप को उनका नाम लेकर न पुकारो।
अपने माँ-बाप के साथ नौकरों जैसा बर्ताव न करो।
बेटे को चाहिए कि वह अपने वालिदैन को हक़ीर ख़ादिमों की तरह न रखे बल्कि इज़्ज़त के साथ रखे [60]।
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