कुरान - 17:24 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

24
وَٱخۡفِضۡ لَهُمَا جَنَاحَ ٱلذُّلِّ مِنَ ٱلرَّحۡمَةِ وَقُل رَّبِّ ٱرۡحَمۡهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرٗا

Transliteration: (Wakhfid lahumaa janaahaz zulli minar rahmati wa qur Rabbir hamhumaa kamaa rabbayaanee sagheera)

और उनके लिए रहमत से आजिज़ी (नम्रता) का बाज़ू झुका दे [61], और अर्ज़ कर, "ऐ मेरे रब! उन दोनों पर रहम फ़रमा जैसा उन्होंने मुझे बचपन में पाला [62]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 24 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह बनी इस्राईल – आयत 24 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और उनके लिए रहमत से आजिज़ी का बाज़ू झुका दे [61], और अर्ज़ कर, 'ऐ मेरे रब! उन दोनों पर रहम फ़रमा जैसा उन्होंने मुझे बचपन में पाला [62]।'"

[61] अमली तौर पर आजिज़ी और शफ़क़त

इसका मतलब यह है कि तुम अमली तौर पर उनके साथ नेक बर्ताव करो, और उन पर माल ख़र्च करने में कभी कंजूसी या हिचकिचाहट न करो; क्योंकि जब तुम बचपन में बिल्कुल बेबस और लाचार थे, तब उन्होंने तुम्हारी परवरिश और देखभाल की थी।

लिहाज़ा अब जब वे बुढ़ापे में लाचार हो गए हैं, तो तुम पर लाज़िम है कि तुम उनकी पूरी देखभाल करो।

[62] शुक्रगुज़ारी में वालिदैन के हक़ में दुआ

इससे यह अहम बात साबित होती है:

  1. कोई भी इन्सान अपने माँ-बाप के एहसानात और हुक़ूक़ का बदला अपनी ताक़त से कभी पूरा अदा नहीं कर सकता।

इसीलिए अल्लाह की बारगाह में उनके हक़ में रहमत की दुआ करना कम से कम वह तोहफ़ा है जो हम उनकी उम्र भर की क़ुर्बानियों के बदले पेश कर सकते हैं।

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