कुरान - 17:26 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

26
وَءَاتِ ذَا ٱلۡقُرۡبَىٰ حَقَّهُۥ وَٱلۡمِسۡكِينَ وَٱبۡنَ ٱلسَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرۡ تَبۡذِيرًا

Transliteration: (Wa aati zal qurbaa haqqahoo walmiskeena wabnas sabeeli wa laa tubazzir tabzeeraa)

और रिश्तेदारों को उनका हक़ दे [64], और मिस्कीन को और मुसाफ़िर को [65], और फ़ुज़ूलख़र्ची (बेजा ख़र्च) न कर [66]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 26 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह बनी इस्राईल – आयत 26 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और रिश्तेदारों को उनका हक़ दे [64], और मिस्कीन को और मुसाफ़िर को [65], और फ़ुज़ूलख़र्ची न कर [66]।"

[64] रिश्तेदारों और अहले-बैत के हुक़ूक़ की अदायगी

माँ-बाप की ख़िदमत के साथ-साथ उनसे जुड़े दूसरे अज़ीज़ों — जैसे भाई, बहन और दीगर रिश्तेदारों — के साथ भी सिलारहमी और भलाई करो।

बाज़ मुफ़स्सिरीन व उलमा-ए-इस्लाम ने इस आयत की तफ़सीर में फ़रमाया कि हमें हुज़ूर अकरम ﷺ के क़राबतदारों (अहले-बैत-ए-अतहार) के हुक़ूक़ सबसे बढ़कर अदा करने चाहिए, क्योंकि माँ-बाप से हमें जिस्मानी ज़िन्दगी मिली है, जबकि हुज़ूर अकरम ﷺ के सदक़े में हमें ईमान और हमेशा की रूहानी ज़िन्दगी नसीब हुई है।

[65] मोहताजों और मुसाफ़िरों की मदद

अगरचे मुसलमान फ़क़ीर (मिस्कीन) और मुसाफ़िर हमारे रिश्तेदार न भी हों, तब भी अपनी ज़कात और सदक़ात से उनकी मदद करो, क्योंकि अल्लाह तआला ने तुम्हें तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा दौलत इसी मक़सद के लिए अता फ़रमाई है।

भैंस को उसके बछड़े की ज़रूरत से कहीं ज़्यादा दूध इसीलिए दिया जाता है ताकि दूसरे लोग भी उससे फ़ायदा उठा सकें।

[66] इसराफ़ और तबज़ीर (फ़ुज़ूलख़र्ची) का फ़र्क़

जाइज़ कामों में ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च करने को 'इसराफ़' कहते हैं, और नाजाइज़ व गुनाह के कामों में एक पैसा भी ख़र्च करने को 'तबज़ीर' कहा जाता है।

तबज़ीर इसराफ़ से कहीं ज़्यादा संगीन और बदतर गुनाह है, इसीलिए यहाँ उसकी सख़्त मज़म्मत फ़रमाई गई है।

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