Transliteration: (Wa immaa tu'ridanna 'anhum ubtighaaa'a rahmatim mir rabbika tarjoohaa faqul lahum qawlam maisooraa)
"और अगर तुम्हें उन से मुँह फेरना पड़े, अपने रब की उस रहमत के इंतिज़ार में जिसकी तुम्हें उम्मीद है, तो उनसे नरम और भली बात कहो [68]।"
यह आयत सिखाती है कि अगर उस वक़्त तुम्हारे पास मदद करने की गुंजाइश न हो — और तुम अल्लाह तआला की रहमत यानी मुस्तक़बिल में रिज़्क़ आने के मुन्तज़िर हो — तो माँगने वाले को सख़्ती से मत झिड़को।
बल्कि उनसे निहायत नर्मी, शाइस्तगी और अच्छी उम्मीद दिलाते हुए बात करो, जैसे यह कहना:
"इंशाअल्लाह, जब अल्लाह तआला मुझे कुशादगी अता फ़रमाएगा तो मैं ज़रूर आपकी ख़िदमत करूँगा।"
इससे ज़रूरतमंद की इज़्ज़त-ए-नफ़्स भी महफ़ूज़ रहती है और यह इस्लाम के आला अख़्लाक़ी आदाब का नमूना है।
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