कुरान - 17:28 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

28
وَإِمَّا تُعۡرِضَنَّ عَنۡهُمُ ٱبۡتِغَآءَ رَحۡمَةٖ مِّن رَّبِّكَ تَرۡجُوهَا فَقُل لَّهُمۡ قَوۡلٗا مَّيۡسُورٗا

Transliteration: (Wa immaa tu'ridanna 'anhum ubtighaaa'a rahmatim mir rabbika tarjoohaa faqul lahum qawlam maisooraa)

और अगर तुम्हें उन (माँगने वालों) से मुँह फेरना पड़े, अपने रब की उस रहमत (रिज़्क़) के इंतिज़ार में जिसकी तुम्हें उम्मीद है, तो उनसे नरम और भली बात कहो [68]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 28 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह बनी इस्राईल – आयत 28 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अगर तुम्हें उन से मुँह फेरना पड़े, अपने रब की उस रहमत के इंतिज़ार में जिसकी तुम्हें उम्मीद है, तो उनसे नरम और भली बात कहो [68]।"

[68] माली तंगी में नर्मी के साथ माज़रत

यह आयत सिखाती है कि अगर उस वक़्त तुम्हारे पास मदद करने की गुंजाइश न हो — और तुम अल्लाह तआला की रहमत यानी मुस्तक़बिल में रिज़्क़ आने के मुन्तज़िर हो — तो माँगने वाले को सख़्ती से मत झिड़को।

बल्कि उनसे निहायत नर्मी, शाइस्तगी और अच्छी उम्मीद दिलाते हुए बात करो, जैसे यह कहना:

"इंशाअल्लाह, जब अल्लाह तआला मुझे कुशादगी अता फ़रमाएगा तो मैं ज़रूर आपकी ख़िदमत करूँगा।"

इससे ज़रूरतमंद की इज़्ज़त-ए-नफ़्स भी महफ़ूज़ रहती है और यह इस्लाम के आला अख़्लाक़ी आदाब का नमूना है।

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