कुरान - 17:29 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
وَلَا تَجۡعَلۡ يَدَكَ مَغۡلُولَةً إِلَىٰ عُنُقِكَ وَلَا تَبۡسُطۡهَا كُلَّ ٱلۡبَسۡطِ فَتَقۡعُدَ مَلُومٗا مَّحۡسُورًا

Transliteration: (Wa laa taj'al yadaka maghloolatan ilaa 'unuqika wa laa tabsut haa kullal basti fataq'uda maloomam mahsooraa)

और अपना हाथ अपनी गर्दन से बँधा हुआ न रख [69], और न उसे बिल्कुल खोल दे [70], कि तू मलामत (निंदा) में पड़ा हुआ और थका-हारा बैठ रहे [71]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह बनी इस्राईल – आयत 29 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अपना हाथ अपनी गर्दन से बँधा हुआ न रख [69], और न उसे बिल्कुल खोल दे [70], कि तू मलामत में पड़ा हुआ और थका-हारा बैठ रहे [71]।"

[69] बुख़्ल (कंजूसी) की मुमानअत

इसका मतलब यह है कि कंजूस और बख़ील मत बनो कि ज़रूरत के वक़्त ख़र्च करने से हाथ रोक लो या हक़दारों के वाजिब हुक़ूक़ अदा करने से मुँह मोड़ लो।

[70] सख़ावत में एतदाल (शाने-नुज़ूल)

शाने-नुज़ूल:
एक बार एक मुसलमान ख़ातून और एक यहूदी औरत के दरमियान इस बात पर चर्चा हुई कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ज़्यादा सख़ी थे या हमारे आक़ा हुज़ूर अकरम ﷺ।

यहूदी औरत ने दावा किया कि हज़रत मूसा अपनी ज़रूरत से ज़ाइद सब कुछ दे देते थे। हुज़ूर अकरम ﷺ की बेमिसाल सख़ावत का मुशाहिदा कराने के लिए उस मुसलमान ख़ातून ने अपनी बेटी को हुज़ूर ﷺ की बारगाह में एक क़मीस (कुर्ता) माँगने भेजा।

उस वक़्त हुज़ूर अकरम ﷺ के पास सिर्फ़ वही एक क़मीस-ए-मुबारक थी जो आपने पहन रखी थी। आपने फ़ौरन अपना कुर्ता उतार कर उसे अता फ़रमा दिया, और बिना कुर्ते के हुजरे में तशरीफ़ फ़रमा रहे यहाँ तक कि नमाज़ के लिए अज़ान भी हो गई।

उस मौक़े पर यह आयत नाज़िल हुई, जिसमें उम्मत को तालीम दी गई कि तुम्हारी अपनी और तुम्हारे अहलो-अयाल की बुनियादी ज़रूरतें आम सदक़े पर मुक़द्दम हैं।
ज़रूरी हाजतें पूरी करने के बाद जो बचे, उसे अल्लाह की राह में ख़र्च करना चाहिए — यही शरीअत का आम क़ानून है।

अलबत्ता हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) की वह बेमिसाल सख़ावत — जब उन्होंने घर का सारा सामान हुज़ूर ﷺ के क़दमों में पेश कर दिया था — वह इश्क़-ए-रसूल ﷺ का ख़ास मक़ाम था, हर आम आदमी के लिए क़ानून नहीं।

[71] इफ़रात व तफ़रीत (दोनों इन्तिहाओं) की मज़म्मत

एतदाल का हुक्म इसलिए दिया गया ताकि लोग तुम्हें बख़ील (कंजूस) या मुसर्रिफ़ (उड़ाऊ) न कहें। आख़िरत में कंजूसी और फ़ुज़ूलख़र्ची दोनों ही इन्सान के लिए वबाल और पछतावे का सबब बनेंगी।

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