कुरान - 17:1 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

1
سُبۡحَٰنَ ٱلَّذِيٓ أَسۡرَىٰ بِعَبۡدِهِۦ لَيۡلٗا مِّنَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ إِلَى ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡأَقۡصَا ٱلَّذِي بَٰرَكۡنَا حَوۡلَهُۥ لِنُرِيَهُۥ مِنۡ ءَايَٰتِنَآۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡبَصِيرُ

Transliteration: (Subhaanal lazeee asraa bi'abdihee lailam minal Masjidil Haraami ilal Masjidil Aqsal-lazee baaraknaa haw lahoo linuriyahoo min aayaatinaa;innahoo Huwas Samee'ul-Baseer)

पाकी है उसे [2] जो रात के एक हिस्से में अपने ख़ास बन्दे [3] को मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक़्सा [5] तक ले गया [4], जिसके गिर्द (आस-पास) हमने बरकतें रखी हैं [6], ताकि हम उसे अपनी बड़ी निशानियाँ दिखाएँ [7]। बेशक वही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है [8]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 1 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-इसरा (बनी इस्राईल) – आयत 1 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"पाकी है उसे [2] जो रात के एक हिस्से में अपने ख़ास बन्दे [3] को मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक़्सा [5] तक ले गया [4], जिसके गिर्द हमने बरकतें रखी हैं [6], ताकि हम उसे अपनी बड़ी निशानियाँ दिखाएँ [7]। बेशक वही सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ देखने वाला है [8]।"


[2] सुब्हान (पाकी है उसे)

लफ़्ज़ 'सुब्हान' का मतलब है हर ऐब, नुक़्स, कमज़ोरी और ज़वाल से मुकम्मल तौर पर पाक व मुनज़्ज़ह होना। यह अल्लाह तआला की कमाल-ए-क़ुदरत और उसकी बे-ऐब ज़ात का इज़हार है। दुआ में अल्लाह का नाम 'या सुब्हान' पुकारना पढ़ने वाले को गुनाहों से पाक करता है और बरकतें खींचता है — जैसे 'या ग़निय्यु' पढ़ने से माल व दौलत की बरकत होती है।

[3] अब्दिही (अपने ख़ास बन्दे)

इससे मुराद हमारे आक़ा हुज़ूर अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ हैं। यह आयत शबे-मेअराज (इसरा व मेअराज) के उस अज़ीम मोजिज़े का बयान करती है जो 621 ईस्वी में पेश आया, जिसमें हुज़ूर ﷺ को बेदारी (जागते हुए) की हालत में जिस्म और रूह के साथ ले जाया गया, कोई महज़ ख़्वाब या रूहानी मुशाहिदा न था। 'अब्दिही' (अपने बन्दे) का लफ़्ज़ अल्लाह तआला की बारगाह में हुज़ूर ﷺ के निहायत क़रीब, लाडले और मुअज़्ज़म रिश्ते की अलामत है। सूरह फ़तह में 'रसूलुल्लाह' फ़रमाया गया और यहाँ मेअराज के वक़्त 'अब्दुल्लाह' फ़रमाकर क़ुर्ब-ए-ख़ास का इज़हार किया गया।

[4] लैलन (रात के थोड़े हिस्से में मस्जिद-ए-हराम से)

मस्जिद-ए-हराम से मुराद मक्का मुअज़्ज़मा का हरम-ए-पाक है। यह मुबारक सफ़र काबा के पास हज़रत उम्मे हानी रज़ियल्लाहु अन्हा के घर से शुरू हुआ, जो इस वाक़िए के हक़ीक़ी और जिस्मानी होने का सुबूत है। लफ़्ज़ 'असरा' (ले गया) साबित करता है कि ले जाने वाला अल्लाह तआला ख़ुद था और हुज़ूर ﷺ इस सफ़र में अल्लाह की ख़ास मइय्यत और हिफ़ाज़त में थे।

[5] मस्जिद-ए-अक़्सा तक

'अक़्सा' के मआनी सबसे दूर की मस्जिद के हैं, और यहाँ इससे मुराद बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम) की मस्जिद-ए-अक़्सा है। मक्का से बैतुल मुक़द्दस का फ़ासला उस ज़माने की आम सवारियों से लगभग एक महीने का था जिसे रात के एक मुख़्तसर हिस्से में तय कराया गया। बैतुल मुक़द्दस तक का यह ज़मीनी सफ़र 'इसरा' कहलाता है जिसका इनकार करना कुफ़्र है; और आसमानों की सैर 'मेअराज' कहलाती है जिसका इनकार करना गुमराही व बिदअत है।

[6] मस्जिद-ए-अक़्सा के गिर्द बरकतें

बैतुल मुक़द्दस और उसके आस-पास अल्लाह तआला ने ज़ाहिरी बरकतें (दरख़्त, नहरें, फल और सरसब्ज़ बाग़ात) और बातिनी बरकतें (कसीर अम्बिया किराम के मज़ारात और वही के मक़ामात) अता फ़रमाई हैं।

[7] अज़ीम निशानियों का मुशाहिदा

अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को बैतुल मुक़द्दस से आगे आसमानों की सैर कराई ताकि अपनी अज़ीम कुदरत की निशानियाँ दिखाएँ: अर्श-ए-अज़ीम, कुर्सी, लौह व क़लम, जन्नत और दोज़ख़, और ख़ुद अपनी ज़ात-ए-अक़्दस का दीदार-ए-पाक। पिछली तमाम उम्मतों और अम्बिया ने इन निशानियों की सिर्फ़ ख़बरें सुनी थीं, मगर हुज़ूर ﷺ ने अपनी मुबारक आँखों से इन तमाम ग़ैबों का मुशाहिदा फ़रमाया। आँखों देखा गवाह सबसे आला होता है, इसलिए हुज़ूर ﷺ के बाद अब कोई नया नबी नहीं आएगा क्योंकि दीन मुकम्मल हो चुका है।

[8] समीउल बसीर

अल्लाह तआला सब कुछ सुनने और देखने वाला है। इसके अलावा अल्लाह तआला की अता से हुज़ूर अकरम ﷺ की मुबारक समाअत व बसारत को भी वह आला मक़ाम बख़्शा गया कि आप ﷺ ने इन तमाम आकाशीय और ग़ैबी निशानियों को बराहे-रास्त मुशाहिदा फ़रमाया।

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