कुरान - 17:7 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

7
إِنۡ أَحۡسَنتُمۡ أَحۡسَنتُمۡ لِأَنفُسِكُمۡۖ وَإِنۡ أَسَأۡتُمۡ فَلَهَاۚ فَإِذَا جَآءَ وَعۡدُ ٱلۡأٓخِرَةِ لِيَسُـُٔواْ وُجُوهَكُمۡ وَلِيَدۡخُلُواْ ٱلۡمَسۡجِدَ كَمَا دَخَلُوهُ أَوَّلَ مَرَّةٖ وَلِيُتَبِّرُواْ مَا عَلَوۡاْ تَتۡبِيرًا

Transliteration: (In ahsantum ahsantum li anfusikum wa in asaatum falahaa; fa izaa jaaa'a wa'dul aakhirati liyasooo'oo wujoo hakum wa liyadkhulul masjida kamaa dakhaloohu awwala marratinw wa liyutabbiroo maa a'law tatbeera)

अगर तुमने भलाई की तो अपने ही लिए भलाई की, और अगर बुराई की तो अपनी ही जान के लिए [19]। फिर जब दूसरे वादे का वक़्त आया [20], तो (हमने दुश्मन भेजे) ताकि वे तुम्हारे चेहरे बिगाड़ दें [21], और मस्जिद (बैतुल मुक़द्दस) में वैसे ही दाख़िल हों जैसे पहली बार दाख़िल हुए थे [22], और जिस चीज़ पर उनका ज़ोर चले उसे पूरी तरह तबाह व बर्बाद कर दें [23]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 7 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-इसरा (बनी इस्राईल) – आयत 7 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"अगर तुमने भलाई की तो अपने ही लिए भलाई की, और अगर बुराई की तो अपनी ही जान के लिए [19]... [20]... [21]... [22]... [23]।"

[19] आमाल का बदला ख़ुद इन्सान पर

नेकी और बदी का बदला इन्सान की अपनी ज़ात की तरफ़ लौटता है। कोई दूसरे का गुनाह नहीं उठाता, मगर जो दूसरों को गुनाह की राह दिखाए वह उनके गुनाह में भी हिस्सेदार बनता है।

[20] दूसरे अज़ाब का वक़्त (हज़रत यह्या की शहादत)

जब बनी इस्राईल ने हज़रत यह्या अलैहिस्सलाम को शहीद किया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल की साज़िश रची, तो अल्लाह ने रूमी बादशाह (क़ैसर-ए-रूम / हेरोडोस) को उन पर मुसल्लत किया। उसने हज़रत यह्या के ख़ून के बदले सत्तर हज़ार यहूदियों को क़त्ल किया।

[21] चेहरों की रुसवाई और दहशत

रूमी फ़ौजों ने उन्हें इस क़दर ज़लील व रुसवा किया कि ज़िल्लत और दहशत उनके चेहरों से टपकने लगी।

[22] मस्जिद-ए-अक़्सा की दोबारा बे-हुर्मती

जैसे पहली बार बुख़्त-ए-नसर ने बैतुल मुक़द्दस को तोड़ा था, वैसे ही रोमियों ने मस्जिद-ए-अक़्सा को दोबारा ढहा दिया और उसे वीरान कर दिया।

[23] मुकम्मल तबाही

रूमी फ़ौजों ने उनके तमाम शहरों, बालिग़ों और महलों को ख़ाक में मिला दिया। सूफ़िया फ़रमाते हैं कि ज़कात न देने से कहत पड़ता है और बदकारी से तबाही व क़त्ल आम होता है।

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