कुरान - 17:57 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

57
أُوْلَـٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ يَبۡتَغُونَ إِلَىٰ رَبِّهِمُ ٱلۡوَسِيلَةَ أَيُّهُمۡ أَقۡرَبُ وَيَرۡجُونَ رَحۡمَتَهُۥ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُۥٓۚ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحۡذُورٗا

Transliteration: (Ulaaa'ikal lazeena yad'oona yabtaghoona ilaa Rabbihimul waseelata ayyuhum aqrabu wa yarjoona rahmatahoo wa yakhaafoona 'azaabah; inna 'azaaba rabbika kaana mahzooraa)

वे लोग जिन्हें ये (मुश्रिक) पुकारते हैं, वे स्वयं अपने रब के निकट पहुंचने का साधन (वसीला/निकटता) तलाश करते हैं कि उनमें से कौन सबसे अधिक निकट हो जाए, और वे उसकी रहमत की आशा रखते हैं और उसके अज़ाब से डरते हैं; निश्चय ही आपके रब का अज़ाब डरने के ही योग्य है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 57 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अल-इस्रा – आयत 57 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] नेक बंदों और फ़रिश्तों की अपनी बंदगी

यह आयत स्पष्ट करती है कि हज़रत ईसा, हज़रत उज़ैर और फ़रिश्ते—जिन्हें अज्ञानी लोग पूजते हैं—वे तो स्वयं अल्लाह के आज्ञाकारी बंदे हैं जो उसकी रज़ा और क़ुरबत (वसीला) के लिए इबादत करते हैं, उसकी रहमत के तलबगार हैं और उसके अज़ाब से कांपते हैं। जब वे स्वयं याचक हैं तो वे दूसरों के माबूद कैसे हो सकते हैं!

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