कुरान - 92:2 सूरह अल-लैल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
وَٱلنَّهَارِ إِذَا تَجَلَّىٰ

Transliteration: (Wannahaari izaa tajalla )

2.और दिन की क़सम, जब वह उजागर हो जाता है।[1] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-लैल आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

रात और दिन की क़सम की व्याख्या
(Explanation of the Oath on Night and Day)

रात और दिन के ज़रिये याद दिलाना
(Night and Day as Reminders)

  • रात मौत की याद दिलाती है, जबकि दिन क़यामत के दिन की निशानी है।
  • रात के दौरान इंसान का इल्म, होश, ताक़त और क़ुव्वत कमज़ोर पड़ जाती है, जो इस बात को समझाती है कि ये चीज़ें हमारी अपनी नहीं हैं।
  • रात के वक़्त इंसान की असलियत सामने आती है:
    • ज़ालिम लोग चोरी और ज़िना जैसी हराम कामों में मशग़ूल होते हैं।
    • नेक लोग तहज्जुद की नमाज़ में मसरूफ रहते हैं और अल्लाह तआला के आगे आंसू बहाते हैं।

रात की अहमियत दिन पर भारी
(Superiority of Night Over Day)
रात दिन से पहले और उसकी अहमियत में ज़्यादा मुक़द्दम (superior) है। इसी वजह से इसे दिन से पहले ज़िक्र किया गया।

हज़रत बिलाल (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रातें और दिन
(Nights and Days of Hazrat Bilal)
ये क़सम हज़रत बिलाल (रज़ी अल्लाहु अन्हु) की रातों और दिनों की तरफ़ भी इशारा कर सकती है। उन्होंने उम्मैयाह बिन ख़ल्फ़ के घर में सख़्त आज़माइशों के बावजूद अल्लाह का ज़िक्र जारी रखा।

सच्चे मोमिनों की रातें और दिन
(Nights and Days of True Devotees)
इसके अलावा, ये सच्चे मोमिनों की रातों और दिनों की तरफ़ इशारा हो सकता है:

  • उनकी रातें अपने सच्चे दोस्त (अल्लाह) की याद में गुज़रती हैं।
  • उनके दिन अल्लाह के ज़िक्र और उसकी रहमत की तलाश में बितते हैं।

ग़फ़लत और तौबा का सबक़
(Negligence and Repentance)
रात ग़फ़लत के लम्हों की अलामत है, जहां मोमिन ग़लतियां करते हैं, और दिन वह वक़्त है जब वो जागते हैं, तौबा करते हैं और माफ़ी मांगते हैं।

  • ऐसे गुनाह, जो तौबा की तरफ़ ले जाते हैं, उन इबादतों से बेहतर हैं जो तकब्बुर (घमंड) को बढ़ावा देती हैं।

तौबा का तकब्बुर पर अफ़ज़ल होना
(Repentance Over Pride)
वह गुनाह, जो इंसान को रोने, तौबा और शर्मिंदगी की तरफ़ ले जाए, उस इबादत से अफ़ज़ल है जो घमंड पैदा करे।

  • मिसाल के तौर पर:
    • हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) का गेहूं खाना, शैतान की हजारों साल की इबादत से अफ़ज़ल ठहरा, क्योंकि यह तौबा और अल्लाह के क़रीब ले जाने का ज़रिया बना।

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