कुरान - 5:100 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

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قُل لَّا يَسۡتَوِي ٱلۡخَبِيثُ وَٱلطَّيِّبُ وَلَوۡ أَعۡجَبَكَ كَثۡرَةُ ٱلۡخَبِيثِۚ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ يَـٰٓأُوْلِي ٱلۡأَلۡبَٰبِ لَعَلَّكُمۡ تُفۡلِحُونَ

Transliteration: (Qul laa yastawil khabeesu wattaiyibu wa law a'jabaka kasratul khabees; fattaqul laaha yaaa ulil albaabi la'allakum tuflihoon)

(ऐ नबी!) कह दीजिए: पाक और नापाक बराबर नहीं हो सकते, चाहे नापाक की भरमार तुम्हें कितनी ही भली क्यों न लगे [271]। तो अल्लाह से डरते रहो, ऐ समझ रखने वालो, ताकि तुम कामयाब हो सको। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 100 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 100 की तफ़्सीर

✅ [271] हक़ का मापदंड न संख्या है, न लोकप्रियता

इस आयत से यह सिखाया गया है कि पाक और नापाक चीज़ें कभी बराबर नहीं हो सकतीं — भले ही नापाक चीज़ों की तादाद ज़्यादा क्यों न हो। दीन के मामले में बहुसंख्यक राय को हमेशा सही नहीं माना जा सकता। एक सच्चा मोमिन, लाखों काफ़िरों से बेहतर है। यही बात हलाल और हराम, परहेज़गार और गुनहगार पर भी लागू होती है। जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: “जहन्नुमी और जन्नती बराबर नहीं” (सूरा 59:20)। और इसी तरह, जानकार और जाहिल भी कभी बराबर नहीं हो सकते।

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