कुरान - 5:101 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

101
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَسۡـَٔلُواْ عَنۡ أَشۡيَآءَ إِن تُبۡدَ لَكُمۡ تَسُؤۡكُمۡ وَإِن تَسۡـَٔلُواْ عَنۡهَا حِينَ يُنَزَّلُ ٱلۡقُرۡءَانُ تُبۡدَ لَكُمۡ عَفَا ٱللَّهُ عَنۡهَاۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٞ

Transliteration: (yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tas'aloo 'an ashyaaa'a in tubda lakum tasu'kum wa in tas'aloo 'anhaa heena yunazzalul Qur'aanu tubda lakum; 'afallaahu 'anhaa; wallaahu Ghafoorun Haleem)

ऐ ईमान वालों! ऐसी चीज़ों के बारे में सवाल मत करो, जो अगर तुम्हें ज़ाहिर कर दी जाएं, तो तुम्हें परेशान कर देंगी [272]। और अगर तुम उनके बारे में उस वक्त पूछोगे जब क़ुरआन नाज़िल हो रहा हो, तो वे तुम्हें ज़ाहिर कर दी जाएंगी। अल्लाह ने जो कुछ पहले हो चुका, उसे माफ़ कर दिया है। और अल्लाह बहुत बख़्शने वाला, बहुत सहनशील है [273]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 101 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 101 की तफ़्सीर

✅ [272] बेहिसाब और नुक़सानदेह सवालों से बचो

यह आयत उस वक्त नाज़िल हुई जब कुछ लोग बेहूदे या ग़ैर-ज़रूरी सवाल करने लगे — जैसे: “मेरा ऊँट कहाँ है?” या “मेरा बाप कौन है?”। रसूल ﷺ ने जवाब तो दिया, लेकिन वह सच्चाई कभी-कभी तकलीफ़देह साबित हुई। इस आयत में चेतावनी दी गई है कि पैग़म्बर के इल्म का इस्तेमाल शरारत या फुज़ूल जिज्ञासा के लिए न किया जाए। नबी ﷺ को शुरू से अंत तक सब कुछ पता था, लेकिन क्या ज़ाहिर करना है, इसका हुक्म अल्लाह देता था। कभी सवाल न करने से ही आसानियाँ बची रहीं, जैसे कि हज हर साल फ़र्ज़ है या नहीं — इस पर नबी ﷺ की चुप्पी ने आसानी पैदा की।

इससे दो उसूल सामने आते हैं:

  1. नबी का इकरार या ख़ामोशी, दोनों ही दीन का हिस्सा हैं।
  2. हर चीज़ जायज़ है जब तक शरियत उसे हराम न कर दे।

✅ [273] अल्लाह की रहमत उन बातों को ढक लेती है जो बयान नहीं की गईं

इस आयत से यह भी साबित होता है कि इस्लाम तंग नहीं, बल्कि रहमत वाला दीन है। जो चीज़ें खुलकर हराम नहीं बताई गईं, वे जायज़ मानी जाती हैं। जैसे कि पेंशन, मीलाद, या उर्स की मजलिसें — जब तक इनके बारे में कोई मनाही नहीं, तब तक वे शरई उसूलों के तहत जायज़ हैं। एक हदीस में आता है: जो चीज़ें अल्लाह ने हलाल कीं, वो हलाल हैं; जो हराम कीं, वो हराम हैं; और जिन पर वह चुप रहा, वह माफ़ कर दी गईं।
यह इस बात की दलील है कि अल्लाह की बख़्शिश और सहनशीलता इस दीन में राहत और आसानी का सबूत हैं, न कि सख़्ती का।

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