Transliteration: (yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tas'aloo 'an ashyaaa'a in tubda lakum tasu'kum wa in tas'aloo 'anhaa heena yunazzalul Qur'aanu tubda lakum; 'afallaahu 'anhaa; wallaahu Ghafoorun Haleem)
यह आयत उस वक्त नाज़िल हुई जब कुछ लोग बेहूदे या ग़ैर-ज़रूरी सवाल करने लगे — जैसे: “मेरा ऊँट कहाँ है?” या “मेरा बाप कौन है?”। रसूल ﷺ ने जवाब तो दिया, लेकिन वह सच्चाई कभी-कभी तकलीफ़देह साबित हुई। इस आयत में चेतावनी दी गई है कि पैग़म्बर के इल्म का इस्तेमाल शरारत या फुज़ूल जिज्ञासा के लिए न किया जाए। नबी ﷺ को शुरू से अंत तक सब कुछ पता था, लेकिन क्या ज़ाहिर करना है, इसका हुक्म अल्लाह देता था। कभी सवाल न करने से ही आसानियाँ बची रहीं, जैसे कि हज हर साल फ़र्ज़ है या नहीं — इस पर नबी ﷺ की चुप्पी ने आसानी पैदा की।
इससे दो उसूल सामने आते हैं:
इस आयत से यह भी साबित होता है कि इस्लाम तंग नहीं, बल्कि रहमत वाला दीन है। जो चीज़ें खुलकर हराम नहीं बताई गईं, वे जायज़ मानी जाती हैं। जैसे कि पेंशन, मीलाद, या उर्स की मजलिसें — जब तक इनके बारे में कोई मनाही नहीं, तब तक वे शरई उसूलों के तहत जायज़ हैं। एक हदीस में आता है: जो चीज़ें अल्लाह ने हलाल कीं, वो हलाल हैं; जो हराम कीं, वो हराम हैं; और जिन पर वह चुप रहा, वह माफ़ कर दी गईं।
यह इस बात की दलील है कि अल्लाह की बख़्शिश और सहनशीलता इस दीन में राहत और आसानी का सबूत हैं, न कि सख़्ती का।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat