Transliteration: (Maa ja'alal laahu mim baheeratinw wa laa saaa'ibatinw wa laa waseelatinw wa laa haaminw wa laakinnal lazeena kafaroo yaftaroona 'alallaahil kazib; wa aksaruhum laa ya'qiloon)
इस आयत में उन मूर्तिपूजक अरबों की झूठी रस्मों को रद्द किया गया है, जिन्होंने कुछ जानवरों को बिना अल्लाह के आदेश के हराम ठहरा लिया था। उदाहरणस्वरूप:
इन जानवरों को न खाने का हुक्म, ना उनका दूध लेने का, ना सवारी का—सिर्फ इसलिए कि इन्हें देवताओं के नाम पर छोड़ा गया था। अल्लाह ने ऐसा कोई हुक्म नहीं दिया, इसलिए इन रस्मों को मानना झूठा और गुमराह करने वाला है।
काफ़िरों ने अल्लाह पर झूठ बांधा, यह कहकर कि उसने ये जानवर हराम किए हैं, जबकि ऐसा कोई हुक्म ना किसी किताब में था, ना किसी नबी ने दिया। उनकी यह बेहूदी बात सिर्फ जाहिलाना रस्मों और समझ की कमी का नतीजा थी।
कई सहाबा इन जानवरों का गोश्त खाते थे और उन्हें ग़नीमत में शामिल करते थे, जिससे साबित होता है कि वे जानवर इस्लामी शरीअत में हलाल हैं। किसी जानवर को सिर्फ इसलिए हराम मान लेना कि वह किसी रस्म या बुत के नाम से जुड़ा है, यह शिर्क वालों का तरीक़ा है, न कि इस्लाम का।
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