कुरान - 5:103 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

103
مَا جَعَلَ ٱللَّهُ مِنۢ بَحِيرَةٖ وَلَا سَآئِبَةٖ وَلَا وَصِيلَةٖ وَلَا حَامٖ وَلَٰكِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ يَفۡتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَۖ وَأَكۡثَرُهُمۡ لَا يَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Maa ja'alal laahu mim baheeratinw wa laa saaa'ibatinw wa laa waseelatinw wa laa haaminw wa laakinnal lazeena kafaroo yaftaroona 'alallaahil kazib; wa aksaruhum laa ya'qiloon)

अल्लाह ने न तो कोई बहीरा, सायिबा, वसीला, और न ही हामी (नाम रखे गए मवेशियों के तौर पर) हराम ठहराया है [275], बल्कि ये तो वे लोग हैं जिन्होंने कुफ्र किया और अल्लाह पर झूठ बांधा, और उनमें से अधिकतर समझते नहीं हैं [276]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 103 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 103 की तफ़्सीर

✅ [275] बिना अल्लाह के हुक्म के कोई जानवर हराम नहीं हो सकता

इस आयत में उन मूर्तिपूजक अरबों की झूठी रस्मों को रद्द किया गया है, जिन्होंने कुछ जानवरों को बिना अल्लाह के आदेश के हराम ठहरा लिया था। उदाहरणस्वरूप:

  • बहीरा: वो ऊँटनी जिसकी पाँचवीं औलाद नर होती, उसके कान चीर दिए जाते और उसे छोड़ा जाता।
  • सायिबा: कोई ऊँटनी जो किसी मन्नत पर छोड़ी जाती थी।
  • वसीला: ऐसा बकरा जो जुड़वाँ नर-मादा औलाद देता।
  • हामी: ऐसा ऊँट जो दस बार बोझ ढोने के बाद छोड़ा जाता।

इन जानवरों को न खाने का हुक्म, ना उनका दूध लेने का, ना सवारी का—सिर्फ इसलिए कि इन्हें देवताओं के नाम पर छोड़ा गया था। अल्लाह ने ऐसा कोई हुक्म नहीं दिया, इसलिए इन रस्मों को मानना झूठा और गुमराह करने वाला है।

✅ [276] झूठे रस्मों और खुद बनाई गई हराम चीज़ों का इनकार

काफ़िरों ने अल्लाह पर झूठ बांधा, यह कहकर कि उसने ये जानवर हराम किए हैं, जबकि ऐसा कोई हुक्म ना किसी किताब में था, ना किसी नबी ने दिया। उनकी यह बेहूदी बात सिर्फ जाहिलाना रस्मों और समझ की कमी का नतीजा थी।

✅ [277] जो चीज़ें हलाल हैं, उन्हें हराम कहना शिर्क की निशानी है

कई सहाबा इन जानवरों का गोश्त खाते थे और उन्हें ग़नीमत में शामिल करते थे, जिससे साबित होता है कि वे जानवर इस्लामी शरीअत में हलाल हैं। किसी जानवर को सिर्फ इसलिए हराम मान लेना कि वह किसी रस्म या बुत के नाम से जुड़ा है, यह शिर्क वालों का तरीक़ा है, न कि इस्लाम का।

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