कुरान - 5:104 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

104
وَإِذَا قِيلَ لَهُمۡ تَعَالَوۡاْ إِلَىٰ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ وَإِلَى ٱلرَّسُولِ قَالُواْ حَسۡبُنَا مَا وَجَدۡنَا عَلَيۡهِ ءَابَآءَنَآۚ أَوَلَوۡ كَانَ ءَابَآؤُهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ شَيۡـٔٗا وَلَا يَهۡتَدُونَ

Transliteration: (Wa izaa qeela lahum ta'aalaw ilaa maaa anzalallaahu wa ilar Rasooli qaaloo hasbunaa maa wajadnaa 'alaihi aabaaa'anaa; awa law kaana aabaaa'uhum laa ya'lamoona shai'anw wa laa yahtadoon)

और जब उनसे कहा जाता है: “आओ उस चीज़ की तरफ जो अल्लाह ने नाज़िल की है और रसूल की तरफ” [278], तो वे कहते हैं, “हमें वही काफ़ी है जिस पर हमने अपने बाप-दादाओं को पाया।” क्या (तुम मानते रहोगे) अगर उनके बाप-दादा ना कुछ जानते थे और ना ही राह पर थे? [279] (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 104 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 104 की तफ़्सीर

✅ [278] सिर्फ क़ुरआन नहीं, रसूल का अनुसरण भी अनिवार्य है

इस आयत में बताया गया है कि हिदायत सिर्फ क़ुरआन को मानने में नहीं, बल्कि रसूल ﷺ की तालीमात को भी अपनाने में है। जो कहें कि “हम सिर्फ क़ुरआन को मानते हैं,” लेकिन रसूल ﷺ की हदीसों को छोड़ दें, वे अधूरे दीन पर हैं। हदीसें क़ुरआन की तशरीह (व्याख्या) हैं, और रसूल ﷺ की इताअत (आज्ञा का पालन) के बिना क़ुरआन को समझना और उस पर अमल करना अधूरा और गुमराह करने वाला हो सकता है।

✅ [279] पूर्वजों की अंधी पैरवी गुमराही है

जो लोग यह कहते हैं कि “हम वही करेंगे जो हमारे पूर्वज करते आए हैं,” भले ही वह बात क़ुरआन और हदीस के खिलाफ़ हो, वे उसी राह पर हैं जिस पर पुराने काफ़िर थे। अल्लाह ऐसे तर्क को खारिज करता है, और सवाल करता है: “क्या अगर तुम्हारे बाप-दादा बिलकुल भी ज्ञान और हिदायत पर ना हों, तब भी उन्हें ही मानते रहोगे?”

सही राह यह है कि इंसान सच को देखे, चाहे वो किसी से भी आए, और हक़ को अपनाए, ना कि अंधी परंपराओं की वजह से गुमराही में पड़ा रहे।

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