कुरान - 5:106 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

106
يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ شَهَٰدَةُ بَيۡنِكُمۡ إِذَا حَضَرَ أَحَدَكُمُ ٱلۡمَوۡتُ حِينَ ٱلۡوَصِيَّةِ ٱثۡنَانِ ذَوَا عَدۡلٖ مِّنكُمۡ أَوۡ ءَاخَرَانِ مِنۡ غَيۡرِكُمۡ إِنۡ أَنتُمۡ ضَرَبۡتُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَأَصَٰبَتۡكُم مُّصِيبَةُ ٱلۡمَوۡتِۚ تَحۡبِسُونَهُمَا مِنۢ بَعۡدِ ٱلصَّلَوٰةِ فَيُقۡسِمَانِ بِٱللَّهِ إِنِ ٱرۡتَبۡتُمۡ لَا نَشۡتَرِي بِهِۦ ثَمَنٗا وَلَوۡ كَانَ ذَا قُرۡبَىٰ وَلَا نَكۡتُمُ شَهَٰدَةَ ٱللَّهِ إِنَّآ إِذٗا لَّمِنَ ٱلۡأٓثِمِينَ

Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo shahaadatu bainikum izaa hadara ahadakumul mawtu heenal wasiyyatis naani zawaa 'adlim minkum aw aakharaani min ghairikum in antum darabtum fil ardi fa asaabatkum museebatul mawt; tahbi soonahumaa mim ba'dis Salaati fa yuqsimaani billaahi inirtabtum laa nashtaree bihee samananw wa law kaana zaa qurbaa wa laa naktumu shahaadatal laahi innaaa izal laminal aasimeen)

ऐ ईमान वालों! [283] जब तुम में से किसी की मौत का वक़्त आए और वह वसीयत कर रहा हो, तो आपस में गवाही ले लो—दो इन्साफ़पसंद आदमी तुम में से हों, या अगर तुम सफर पर हो और मौत की मुसीबत आ जाए, तो क़ौम के अलावा के दो आदमी भी हो सकते हैं। नमाज़ के बाद दोनों को रोक लो [286]—अगर तुम्हें शक हो—तो वे अल्लाह की क़सम खाएं [287] कि "हम इसे किसी कीमत पर नहीं बदलेंगे, चाहे वह हमारा करीबी रिश्तेदार ही क्यों न हो, और हम अल्लाह की गवाही को नहीं छुपाएंगे।" अगर वे ऐसा करें तो वो ज़ालिमों में से होंगे। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 106 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 106 की तफ़्सीर

✅ [283] वाही का कारण: चाँदी का प्याला ग़ायब होने की घटना

यह आयत हज़रत बुदैल, अम्र बिन आउस के गुलाम, की वसीयत से संबंधित है। वे दो ईसाई व्यापारियों—तमीम बिन आउस और अदी बिन बुदा—के साथ शाम की यात्रा पर गए। मरने से पहले बुदैल ने अपने सामान की सूची उन्हें सौंपी। वे वापस मदीना आए लेकिन एक चाँदी मढ़ा हुआ प्याला छुपा लिया और बेच दिया। बाद में वह प्याला मक्का में मिला और धोखाधड़ी साबित हुई। तब यह आयत नाज़िल हुई ताकि ऐसे मामलों में वसीयत और गवाही का नियम तय हो।

✅ [284] वसीयत कब लिखी जाती है

वसीयत का वक़्त तब माना जाता है जब मौत की अलामतें साफ़ हो जाएँ। हालांकि, पहले भी वसीयत की जा सकती है। वसीयत वह अमल है जिसमें इंसान अपने माल का हिस्सा किसी को देता है, बग़ैर किसी मुआवज़े के। यह सिर्फ मौत के बाद लागू होती है। इस आयत में वसीयत की गवाही को ज़रूरी बताया गया है, ताकि झगड़ों और धोखों से बचा जा सके।

✅ [285] सफर के दौरान बाहरी गवाह भी मान्य

जब सफर में हो और अपनी क़ौम के मुसलमान मौजूद न हों, तो दूसरी क़ौम के मुसलमान गवाह बन सकते हैं। इस आयत का "दो गैरों में से दो" का मतलब ग़ैर-क़ौमी मुसलमान हैं, काफ़िरों की गवाही इस्लामी अदालत में मान्य नहीं।

✅ [286] अस्र की नमाज़ के बाद शपथ लेना

क़सम अस्र की नमाज़ के बाद ली जाती है, क्योंकि यह वक्त अरबों में गंभीर और सच्चाई का वक़्त माना जाता था। रसूलुल्लाह ﷺ ने भी अपने मिंबर के पास कसम दिलाई। आज भी मस्जिद, मज़ार या काबा जैसे मुक़द्दस स्थानों पर क़सम लेना सच बोलने की संभावना बढ़ाता है।

✅ [287] शक गवाहों की सच्चाई पर होता है

यहाँ "अगर तुम्हें शक हो" से मुराद यह है कि गवाहों की ईमानदारी या परहेज़गारी पर शक हो। ऐसे मामलों में एहतियात बरतना ज़रूरी है, ख़ासकर जब बात माल और अमानत की हो।

✅ [288] झूठी गवाही और रिश्वत के खिलाफ चेतावनी

आयत के अंत में चेतावनी दी गई है कि माल के लालच या रिश्तेदारी की वजह से झूठी गवाही देना बड़ा गुनाह है। अल्लाह की गवाही को न छुपाना और सच्चाई को कायम रखना हर मोमिन की जिम्मेदारी है। जो ऐसा नहीं करता, वो ज़ालिम कहलाता है।

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