कुरान - 5:107 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

107
فَإِنۡ عُثِرَ عَلَىٰٓ أَنَّهُمَا ٱسۡتَحَقَّآ إِثۡمٗا فَـَٔاخَرَانِ يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا مِنَ ٱلَّذِينَ ٱسۡتَحَقَّ عَلَيۡهِمُ ٱلۡأَوۡلَيَٰنِ فَيُقۡسِمَانِ بِٱللَّهِ لَشَهَٰدَتُنَآ أَحَقُّ مِن شَهَٰدَتِهِمَا وَمَا ٱعۡتَدَيۡنَآ إِنَّآ إِذٗا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Transliteration: (Fa in 'usira 'alaaa annahumas tahaqqaaa isman fa aakharaani yaqoomaani maqaamahumaa minal lazeenas tahaqqa 'alaihimul awlayaani fa yuqsimaani billaahi lashahaadatunaaa ahaqqu min shahaadatihimaaa wa ma'tadainaaa innaaa izal laminaz zaalimeen)

फिर अगर पता चल जाए कि उन दोनों ने गुनाह किया है [289], तो उनकी जगह दो और आदमी खड़े हों, जो मृतक के सबसे क़रीबी रिश्तेदारों में से हों, जिनका हक़ इस झूठी गवाही की वजह से मारा गया है। वे अल्लाह की क़सम खाएं कि "हमारी गवाही, इन दोनों की गवाही से ज़्यादा सच्ची है, और हमने हद से तजावुज़ नहीं किया [290]। अगर हमने ऐसा किया, तो हम ज़ालिमों में से होंगे [292]।" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 107 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-माइदा – आयत 107 की तफ़्सीर

✅ [289] बुदैल के केस में झूठ पकड़ में आना

यहाँ "गुनाह किया है" से मुराद है—तमीम और अदी का झूठ पकड़ में आना। उन्होंने हज़रत बुदैल की वसीयत में से चाँदी का प्याला छुपाया था, जो बाद में मक्का में मिल गया। इससे साबित हो गया कि उन्होंने विरासत की अमानत में खयानत की थी, और इसीलिए उन्हें गुनहगारों में से माना गया।

✅ [290] झूठ पकड़े जाने पर वारिसों का हक़

जब झूठी गवाही साबित हो जाए, तब मृतक के सबसे क़रीबी दो वारिसों को आगे लाया जाए। वे क़सम खाएं कि उनकी गवाही ज्यादा सच्ची है। इससे मालूम होता है कि माली और विरासत के मामलों में दो गवाह ज़रूरी हैं। अलग-अलग मामलों में गवाहों की तादाद अलग हो सकती है—जैसे ज़िना में चार, चाँद देखने में एक।

✅ [291] बुदैल के वारिसों की क़सम

जब प्याला बरामद हो गया, तो बुदैल के दो वारिसों ने क़सम खाई कि वही उनका सामान है और उनकी गवाही सच्ची है। यह इस बात का सबूत है कि वारिसों की गवाही से झूठी गवाही को रद्द किया जा सकता है, ख़ासकर जब मामला विरासत के हक़ की पामाली का हो।

✅ [292] दावा और इंकार—दोनों पर सुबूत की ज़िम्मेदारी

यह आयत बताती है कि अगर दोनों पक्ष किसी हक़ का दावा कर रहे हों, तो सिर्फ़ दावा नहीं, बल्कि गवाही और क़सम से उसे साबित करना ज़रूरी है। अगर कोई किसी दावे को झुटलाता है, तो उसे भी क़सम या सुबूत देना होगा। हज़रत बुदैल का वाक़िआ बताता है कि इलाही कानून और गवाही के ज़रिए इंसाफ़ कैसे कायम किया जाता है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now