Transliteration: (Fa in 'usira 'alaaa annahumas tahaqqaaa isman fa aakharaani yaqoomaani maqaamahumaa minal lazeenas tahaqqa 'alaihimul awlayaani fa yuqsimaani billaahi lashahaadatunaaa ahaqqu min shahaadatihimaaa wa ma'tadainaaa innaaa izal laminaz zaalimeen)
यहाँ "गुनाह किया है" से मुराद है—तमीम और अदी का झूठ पकड़ में आना। उन्होंने हज़रत बुदैल की वसीयत में से चाँदी का प्याला छुपाया था, जो बाद में मक्का में मिल गया। इससे साबित हो गया कि उन्होंने विरासत की अमानत में खयानत की थी, और इसीलिए उन्हें गुनहगारों में से माना गया।
जब झूठी गवाही साबित हो जाए, तब मृतक के सबसे क़रीबी दो वारिसों को आगे लाया जाए। वे क़सम खाएं कि उनकी गवाही ज्यादा सच्ची है। इससे मालूम होता है कि माली और विरासत के मामलों में दो गवाह ज़रूरी हैं। अलग-अलग मामलों में गवाहों की तादाद अलग हो सकती है—जैसे ज़िना में चार, चाँद देखने में एक।
जब प्याला बरामद हो गया, तो बुदैल के दो वारिसों ने क़सम खाई कि वही उनका सामान है और उनकी गवाही सच्ची है। यह इस बात का सबूत है कि वारिसों की गवाही से झूठी गवाही को रद्द किया जा सकता है, ख़ासकर जब मामला विरासत के हक़ की पामाली का हो।
यह आयत बताती है कि अगर दोनों पक्ष किसी हक़ का दावा कर रहे हों, तो सिर्फ़ दावा नहीं, बल्कि गवाही और क़सम से उसे साबित करना ज़रूरी है। अगर कोई किसी दावे को झुटलाता है, तो उसे भी क़सम या सुबूत देना होगा। हज़रत बुदैल का वाक़िआ बताता है कि इलाही कानून और गवाही के ज़रिए इंसाफ़ कैसे कायम किया जाता है।
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