Transliteration: (yawma yajma'ul laahur Rusula fa yaqoolu maazaaa ujibtum qaaloo laa 'ilma lanaa innaka Anta 'Allaamul Ghuyoob)
✅ [295] यह सवाल काफ़िरों की तक़ज़ीब को उजागर करने के लिए है
यह सवाल अल्लाह की जानकारी के लिए नहीं है, क्योंकि अल्लाह को सब कुछ मालूम है। बल्कि, यह सवाल क़ियामत के दिन अदालत में सबूत पेश करने और काफ़िरों की दुश्मनी और इंकार को उजागर करने के लिए किया जाएगा। कई बार अल्लाह ऐसे सवाल हक़ को ज़ाहिर करने और गवाहियाँ क़ायम करने के लिए करता है, ताकि सबके सामने इंसाफ़ और हक़ीक़त खुलकर सामने आ जाए।
रसूलों का यह जवाब "हमें कोई इल्म नहीं" उनकी अज्ञानता की वजह से नहीं होगा, बल्कि अल्लाह की महानता और डर की वजह से होगा। क़ियामत के दिन का मंजर ऐसा होगा कि सब पर खौफ़ और अल्लाह की जलालत तारी होगी। इस जवाब का एक मक़सद उन लोगों की तज़लील करना भी है जो पैग़म्बरों की शफ़ाअत (सिफारिश) का इंकार करते थे।
हालाँकि क़ियामत के दूसरे मौक़ों पर पैग़म्बर अपनी उम्मतों के बारे में गवाही देंगे, जैसे कि क़ुरआन में आया:
"ऐ मेरे रब! मेरी क़ौम ने इस क़ुरआन को छोड़ रखा था" (सूरा अल-फुरकान 25:30)।
इस आयत से पैग़म्बरों के इल्म या मर्तबे का इनकार नहीं होता, बल्कि यह दिखाता है कि हर शख़्स अपने आमाल को याद करेगा, जैसा कि (सूरा नाज़िआत 79:35) में बताया गया है। पैग़म्बर भी याद करेंगे कि उन्होंने किन हालात में हक़ पहुँचाया, और कैसे उनकी बदतरीन मुख़ालफ़त की गई।
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