कुरान - 5:111 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

111
وَإِذۡ أَوۡحَيۡتُ إِلَى ٱلۡحَوَارِيِّـۧنَ أَنۡ ءَامِنُواْ بِي وَبِرَسُولِي قَالُوٓاْ ءَامَنَّا وَٱشۡهَدۡ بِأَنَّنَا مُسۡلِمُونَ

Transliteration: (Wa iz awhaitu ilal hawaariyyeena an aaminoo bee wa bi Rasoolee qaalooo aamannaa washhad bi annanaa muslimoon)

और जब मैंने प्रेरित किया (305) हवारियों को कि मुझ पर और मेरे रसूल पर ईमान लाओ, तो उन्होंने कहा, “हम ईमान लाए, और तू गवाह रह कि हम मुसलमान हैं (306)।” (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 111 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-माइदा – आयत 111

✅ 305 – ग़ैर-नबी को 'वही' देने का मतलब

"और जब मैंने प्रेरित किया हवारियों को..." यहाँ 'वही' (प्रेरणा) का मतलब नबी वाली वह्य नहीं है, बल्कि दिलों में डाली गई अल्लाह की प्रेरणा है। यही शब्द दूसरी जगहों पर भी आया है, जैसे:

  • "हमने मूसा की माँ के दिल में प्रेरणा डाली" (सूरा क़सस 28:7)
  • "और तुम्हारे रब ने मधुमक्खी को प्रेरणा दी" (सूरा नहल 16:68)
    इससे यह स्पष्ट होता है कि अल्लाह अपने बंदों के दिलों में बिना ज़बान के सीधे मार्गदर्शन डाल सकता है।

✅ 306 – खुले तौर पर ईमान का इज़हार और रसूल को गवाह बनाना

"हम ईमान लाए, और तू गवाह रह कि हम मुसलमान हैं" — इस वाक्य से दो अहम बातें निकलती हैं:

  1. ईमान का इज़हार ज़रूरी है — सिर्फ दिल में रखने से नहीं, बल्कि ज़बान से कहने से भी उसका पूरा असर होता है।
  2. रसूल को गवाह बनाना — अपने ईमान पर रसूल को गवाह बनाना एक अत्यंत सम्मानजनक और आत्मा को ऊँचा करने वाला कार्य है, क्योंकि अल्लाह के नबी ईमान पर गवाही देने वाले होते हैं।

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