Transliteration: (Zaalika adnaaa ai ya'too bishshahaadati 'alaa wajhihaaa aw yakhaafooo an turadda aimaanum ba'da aimaanihim; wattaqul laaha wasma'oo; wallaahu laa yahdil qawmal faasiqeen)
इस आयत का मक़सद यह बताना है कि जब लोगों को क़सम दिलवाई जाती है, तो वे झूठ बोलने से डरते हैं। उन्हें यह डर होता है कि अगर झूठ पकड़ा गया, तो उनकी क़समें रद्द कर दी जाएँगी, और जमाअत में रुस्वाई होगी, साथ ही अल्लाह की सज़ा का ख़ौफ़ भी होता है। इस प्रक्रिया से इंसाफ़ क़ायम होता है और माली धोखाधड़ी के मामलों में सच सामने आता है, ख़ासकर विरासत से जुड़े मामलों में।
"अल्लाह से डरते रहो और सुनो"—इसका मतलब है कि हिदायत उन्हीं को मिलती है जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी बात मानते हैं। जो लोग नाफ़रमान होते हैं—चाहे वो काफ़िर हों या फासिक़—उन्हें क़ब्र में जवाब, क़ियामत का रास्ता और जन्नत की राह नहीं दिखाई जाती। इसके बरअक्स, ईमान वाले अल्लाह की रहमत से सच्चे जवाब देने में सफल होंगे। साथ ही यह भी साबित होता है कि सही अमल की तौफ़ीक़, सही अकीदे से जुड़ी होती है। अगर कोई कुफ्र पर अड़ा रहे, तो हिदायत और नेक अमल से महरूम रह जाता है।
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