Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo 'alaikum anfusakum laa yadurrukum man dalla izah tadaitum; ilal laahi marji'ukum jamee'an fayunabbi'ukum bimaa kuntum ta'maloon)
इस आयत में ईमान वालों को आदेश दिया गया है कि पहले अपने आप को सुधारो। दूसरों की गलतियों और गुमराही में उलझने से पहले अपनी आत्मा की पवित्रता और अपने अमल की सच्चाई को देखो। जो अपने आप को नहीं सुधारता, वह दूसरों को भी सही रास्ता नहीं दिखा सकता। इस्लाह (सुधार) की शुरुआत अपने आप से होती है, ना कि दूसरों की निगरानी से।
अगर तुम हिदायत पर क़ायम हो, तो गुमराह लोगों की बातें या हरकतें तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकतीं। हां, इसका यह मतलब नहीं कि दावत और अम्र बिल म'आरूफ (अच्छाई का हुक्म देना) छोड़ दो, बल्कि हिदायत पर मज़बूती से टिके रहो और सही बात फैलाते रहो।
हर इंसान को अल्लाह की तरफ लौटना है, और वहां हर एक अमल, चाहे वह अकेले किया हो या किसी के जरिये, खोल कर सामने रखा जाएगा। अल्लाह फ़रमाएगा: “हम तुम्हें बता देंगे” – यानी कोई भी अमल छुपा नहीं रहेगा। इसलिए हर मोमिन को अपने हर काम का जवाबदेह बन कर जीना चाहिए।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat