Transliteration: (Qaalal laahu innee munaz ziluhaa 'alaikum famai yakfur ba'du minkum fa inneee u'azzibuhoo 'azaabal laaa u'azzibuhooo ahadam minal 'aalameen)
यह ऐलान सिर्फ हवारीयों के लिए नहीं था, बल्कि हर उस शख़्स के लिए था जो भविष्य में भी ऐसे खुले मोजिज़े को देखने के बाद कुफ़्र करेगा। जो कोई हक़ की ऐसी वाज़ेह निशानी देखने के बाद भी इंकार करता है, उसे बेहद सख़्त और अनोखा अज़ाब दिया जाएगा, जो दुनिया की किसी भी क़ौम को नहीं दिया गया। यह बताता है कि हक़ को देखने के बाद उसका इंकार करना, अल्लाह की नज़र में बेहद संगीन गुनाह है।
इस आयत से ये सबक़ मिलता है कि मोजिज़ा मांगना और फिर ईमान न लाना, अल्लाह के अज़ाब को खुद बुलाने जैसा है। अबू जहल को भी कई मोजिज़े दिखाए गए थे, लेकिन उसे अज़ाब नहीं मिला, क्योंकि हज़रत मुहम्मद ﷺ मौजूद थे। जैसा कि अल्लाह ने फ़रमाया: “अल्लाह उन्हें अज़ाब नहीं देगा जब तक कि तुम उनके बीच मौजूद हो” (सूरा अल-अन्फाल 8:33)। यानी नबी की मौजूदगी खुद एक रहमत और हिफाज़त थी—even उन काफ़िरों के लिए।
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