Transliteration: (yaaa Ahlal kitaabi qad jaaa'akum Rasoolunaa yubaiyinu lakum kaseeram mimmmaa kuntum tukhfoona minal Kitaabi wa ya'foo 'an kaseer; qad jaaa'akum minal laahi noorunw wa Kitaabum Mubeen)
इससे मालूम हुआ कि रसूलुल्लाह ﷺ आसमानी किताबों के अहकाम और हुक्मों से पूरी तरह वाक़िफ़ थे।
आप ﷺ जानते थे कि कौन-सी बातें असल थीं और कौन-सी तहरीफ़ (बदलाव) की गई थीं।
चूंकि ये किताबें अब मनसूख़ (रद्द) हो चुकी थीं, इसलिए नबी ﷺ को उनको पूरी तरह दुरुस्त करने का हुक्म नहीं था,
लेकिन कुछ हुक्मों की तस्दीक़ व तज़किर जरूर की, जैसे राज़म (पत्थर से मारकर सज़ा) का मसला।
हज़रत मुल्ला अली क़ारी रहमतुल्लाह अलैह (शरह शिफ़ा) में फ़रमाते हैं कि "नूर" और "रौशन किताब" दोनों से मुराद नबी करीम ﷺ हैं।
आप ﷺ अल्लाह की ज़ात, उस की सिफ़ात, उस के हुक्म और इल्म का ज़ाहिरी मज़हर हैं।
नबी ﷺ को "नूर" इसलिए कहा गया कि सबसे पहले अल्लाह तआला की नेमतें और बरकतें उन्हीं पर नाज़िल हुईं,
और उन्हीं के वसीले से बाक़ी आलम को मिलीं।
नबी ﷺ का नूर ऐसा है जिसे कोई ख़त्म नहीं कर सकता, जैसे सूरज और चाँद की रौशनी कोई नहीं रोक सकता।
क़ुरआन को सही समझने के लिए नबी ﷺ की ज़रूरत है — उनके बिना क़ुरआन को पढ़ा या समझा नहीं जा सकता।
क़ुरआन के ज़ाहिरी अहकाम को समझने के लिए जिस्मानी पाकीज़गी (ग़ुस्ल वग़ैरह) ज़रूरी है,
लेकिन अंदरूनी हक़ीक़तें समझने के लिए दिल की पाकीज़गी और मदीना की रूहानी रोशनी ज़रूरी है।
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