Transliteration: (Fabimaa naqdihim meesaa qahum la'annaahum wa ja'alnaa quloobahum qaasiyatai yuharrifoonal kalima 'ammawaadi'ihee wa nasoo hazzam mimmaa zukkiroo bih; wa laa tazaalu tattali'u 'alaa khaaa'inatim minhum illaa qaleelam minhum fa'fu 'anhum wasfah; innal laaha yuhibbul muhsineen)
इस आयत से मालूम होता है कि बनी इस्राईल ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के बाद आने वाले नबियों को न सिर्फ़ नकारा, बल्कि उनसे दुश्मनी भी रखी और तौरात में हज़रत मुहम्मद ﷺ की जो खूबियाँ थीं, उन्हें छुपाया।
अहद तोड़ना बहुत बड़ा गुनाह है, और इसका नतीजा अल्लाह की लानत है — यानी अल्लाह की रहमत से महरूमी।
यहाँ से ये हकीकत सामने आती है कि दिल की सख़्ती — यानी बेपरवाही और बेरहमी — गुनाहों की वजह से होती है, और परहेज़गारी से दिल नर्म होता है।
जो इंसान बार-बार गुनाह करता है, उसके दिल पर एक परदा चढ़ जाता है, जिससे नसीहत का असर ख़त्म हो जाता है।
इस आयत में साफ़ किया गया कि अल्लाह के कलाम में तहरीफ़ (बदलाव) करना — चाहे शब्दों में हो या मतलब में — बहुत बड़ा गुनाह है।
यहाँ तक कि क़ुरआन की तिलावत में जानबूझकर किसी हरफ को ग़लत पढ़ना — जैसे "क़ाफ़" को "काफ़" या "द्वाद" को "ज़्वा" — भी सख़्त गुनाह है।
अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम जो इस्लामी रियासत में रहता हो, किसी छोटे वादे की ख़िलाफ़वर्जी कर दे, लेकिन जिज़िया (टैक्स) अदा करता रहे, तो उसे माफ़ करना बेहतर है।
इस आयत का संबंध उन यहूदियों से भी जो पहले रसूलुल्लाह ﷺ से एक समझौता कर चुके थे लेकिन फिर तोड़ दिया।
अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को हुक्म दिया कि इनकी इस वादाख़िलाफ़ी को नजरअंदाज़ करें, यानी सख़्ती न करें।
नेकी और दरगुज़र करना अल्लाह को पसंद है, और यह इस्लाम का उच्चतम दर्जा है।
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