Transliteration: (Wa laqad akhazal laahu meesaaqa Banee Israaa'eela wa ba'asnaa minhumus nai 'ashara naqeebanw wa qaalal laahu innee ma'akum la'in aqamtumus Salaata wa aataitumuz Zakaata wa aamantum bi Rusulee wa'azzartumoohum wa aqradtumul laaha qardan hasanal la ukaffiranna 'ankum saiyiaatikum wa la udkhilan nakum Jannaatin tajree min tahtihal anhaar; faman kafara ba'da zaalika minkum faqad dalla sawaaa'as Sabeel)
इस आयत से मालूम होता है कि अल्लाह ने यह अहद (वाचा) अपने खास बंदों यानी नबियों से लिया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अल्लाह का काम वही है जो उसके खास बंदे करें, क्योंकि यह अहद खुद अल्लाह ने लिया।
"नक़ीब" शब्द "नग़्ब" से लिया गया है, जिसका मतलब होता है गहराई से जांच करना। यानी ये सरदार ऐसे लोग थे जो अपनी क़ौम के हालात को अच्छे से जानते और सुधारते थे। इससे यह मालूम हुआ कि जो लोग काबिल हों उन्हें दीनी नेतृत्व देना जायज़ है।
हुज़ूर ﷺ ने भी मदीना में अंसार के बारह सरदार नियुक्त किए थे ताकि वे मुसलमानों के दीनी मामलों की देखरेख करें और कमियों को दूर करें।
इससे दो बातें निकलती हैं:
बनी इस्राईल पर भी नमाज़ और ज़कात फ़र्ज़ थीं, लेकिन हमारे जैसी नहीं। उन पर दिन में सिर्फ़ दो नमाज़ें फ़र्ज़ थीं और ज़कात उनकी कुल दौलत का चौथाई हिस्सा होती थी।
परहेज़गारी और नेक आमाल मुसलमान का सबसे बड़ा हथियार हैं, ख़ासकर जिहाद के दौरान।
क़ुरआन कहता है: "जब तुम किसी फ़ौज से मुकाबला करो तो जमकर खड़े हो जाओ, और अल्लाह को खूब याद करो, ताकि तुम कामयाब हो सको" (सूरा 8, आयत 45)
यहां से यह बात साफ होती है कि रसूलुल्लाह ﷺ की ताज़ीम खुद अल्लाह की इबादत है। अल्लाह ने इस पर क़सम खाई। इस ताज़ीम की कोई सीमा नहीं बताई गई।
सजदा या उन्हें अल्लाह या उसका बेटा समझना मना है, लेकिन इनके अलावा हर तरह की इज्ज़त और अदब जायज़ और सवाब का काम है। इसके लिए किसी दलील या हदीस की ज़रूरत नहीं — हर ताज़ीम नेक अमल है।
ग़रीबों को सदक़ा देना अल्लाह को क़र्ज़ देने के बराबर है, जैसे बेटे से अच्छा सुलूक करना बाप के साथ नेकी समझी जाती है।
इस्लाम की बरकत से कुफ्र के दौर के सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं। लेकिन इस्लाम लाने के बाद किए गए गुनाह माफ़ नहीं होते, जब तक इंसान खुद तौबा न करे।
इस्लाम लाने के बाद के अच्छे आमाल की बरकत से छोटे-छोटे गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं।
क़ुरआन कहता है: "अगर तुम बड़े गुनाहों से बचते रहोगे जो तुम्हें मना किए गए हैं, तो हम तुम्हारे बाकी गुनाह माफ़ कर देंगे" (सूरा 4, आयत 31)
"दाख़िल करना" का मतलब है कि क़ब्र के वक़्त और क़ियामत के बाद — दोनों मरहलों के बाद — जन्नत में दाख़िला मिलेगा।
हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने जब जब्बारीन क़ौम पर जिहाद की तैयारी की, तो बारह सरदारों को भेजा कि पहले जाकर हालात का जायज़ा लें। उन्हें हुक्म था कि सिर्फ़ देखी हुई बातें कहें, लेकिन उन्होंने वापस आकर ऐलान कर दिया कि वो लोग ताक़तवर और लड़ाके हैं।
सिर्फ़ क़ालिब इब्न युगन्ना और युशअ इब्न नून ने अहद को निभाया।
इस आयत में "कुफ्र" से मुराद है — हज़रत मूसा से किया गया वादा तोड़ना।
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