कुरान - 5:16 सूरह अल-मायदा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

16
يَهۡدِي بِهِ ٱللَّهُ مَنِ ٱتَّبَعَ رِضۡوَٰنَهُۥ سُبُلَ ٱلسَّلَٰمِ وَيُخۡرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ بِإِذۡنِهِۦ وَيَهۡدِيهِمۡ إِلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ

Transliteration: (Yahdee bihil laahu manit taba'a ridwaanahoo subulas salaami wa yukhrijuhum minaz zulumaati ilan noori bi iznihee wa yahdeehim ilaa Siraatim Mustaqeem)

अल्लाह उसी (नूर) के ज़रिये उसे हिदायत देता है जो उसकी रज़ा का तालिब होता है — सलामती के रास्तों की तरफ़, और उन्हें अपनी इजाज़त से अंधेरों से निकालकर रोशनी में लाता है, और उन्हें सीधी राह दिखाता है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मायदा आयत 16 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-मायिदा – आयत 16 की तफ़्सीर

 

✅ [70] रसूल ﷺ के ज़रिये हिदायत

इस आयत से ये मालूम होता है कि हिदायत उन्हीं को मिलती है जो रसूलुल्लाह ﷺ की पैरवी करते हैं।
रसूल ﷺ अल्लाह की हिदायत का ज़रिया हैं, इसलिए कोई शख्स अगर सच्ची राह चाहता है तो उसे नबी ﷺ से अलग रहकर नहीं मिल सकती।
इसलिए, "उसके ज़रिये हिदायत देता है" का मतलब है कि रसूल ﷺ की वसीलत के बग़ैर कोई राह नहीं पा सकता।

✅ [71] ईमान — नूर | कुफ्र — ज़ुल्मतें

"नूर" और "ज़ुल्मात" (अंधेरे) के अल्फ़ाज़ से कई अहम बातें सामने आती हैं:

  • ईमान एक रोशनी है और कुफ्र कई किस्मों का अंधेरा है,
    इसलिए "नूर" एकवचन में आया और "ज़ुल्मात" बहुवचन में।
  • ईमान तब तक मुकम्मल नहीं होता जब तक हर किस्म के कुफ्र और गुमराही से खुद को जुदा न किया जाए।
  • जैसे नूर और अंधेरा एक साथ नहीं हो सकते, वैसे ही मोमिन और काफ़िर के बीच रूहानी इत्तेहाद मुमकिन नहीं।

✅ [72] नेक आमाल की तरफ़ रहनुमाई

"सीधी राह दिखाता है" से मुराद ये है कि अल्लाह तआला सिर्फ़ ईमान ही नहीं देता, बल्कि नेक आमाल की भी तौफ़ीक़ देता है।
क्योंकि इस आयत में पहले ईमान का ज़िक्र हो चुका,
अब इस हिस्से में आमाल की सही रह दिखाने की बात है —
यानि सिर्फ़ मुसलमान कहलाना काफी नहीं, बल्कि सही रास्ते पर चलना भी ज़रूरी है।

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