Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tuhilloo sha'aaa 'iral laahi wa lash Shahral Haraama wa lal hadya wa lal qalaaa'ida wa laa aaammeenal Baital Haraama yabtaghoona fadlam mir Rabbihim wa ridwaanaa; wa izaa halaltum fastaadoo; wa laa yajrimannakum shana aanu qawmin an saddookum 'anil Masjidil-Haraami an ta'tadoo; wa ta'aawanoo 'alalbirri wattaqwaa; wa laa ta'aawanoo 'alal ismi wal'udwaan; wattaqul laah; innal laaha shadeedul 'iqaab)
"अल्लाह की निशानियाँ" से यह बात सामने आती है कि हर वह चीज़ जो दीनी एहतिराम रखती है, उसका अदब करना चाहिए। अल्लाह फ़रमाता है: "जो कोई अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करता है, तो यह दिल की परहेज़गारी से है।" (सूरह हज: 32)
काबा शरीफ़, औलिया अल्लाह के मज़ारात, कुरआन-ए-पाक — ये सभी अल्लाह की निशानियों में शामिल हैं। हज़रत हाजिरा (अ.स.) के क़दम जहां सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों से गुज़रे, वहीं वे पहाड़ियाँ भी अल्लाह की निशानी बन गईं।
चार हराम महीने — रजब, ज़िलक़ादा, ज़िलहिज्जा, और मुहर्रम — पहले ज़माने में भी मोअज़्ज़ज़ थे और इस्लाम ने भी इन्हें मुक़द्दस माना है।
शुरुआत में इन महीनों में लड़ाई हराम थी, हालांकि अब जिहाद का वक़्ती हुक्म नहीं है, मगर इन महीनों का अदब हमेशा के लिए बाक़ी है।
अरबों की रिवायत थी कि वे कुर्बानी के जानवरों की गर्दन में रंग-बिरंगे कपड़े या पटके डालते थे ताकि लोग जान लें कि ये अल्लाह के नाम के लिए हैं और इन्हें कोई तकलीफ़ न पहुँचाए।
यह उन लोगों की तरफ़ इशारा है जो अपने रब का फज़ल और उसकी रज़ा पाने के लिए काबा की तरफ़ सफ़र कर रहे होते हैं।
वज़ह-ए-नुज़ूल: एक बार शुरीह बिन हिंद मदीना आए और वापसी में लोगों की बकरियाँ व मवेशी साथ ले गए। मुसलमानों को इसका बहुत दुख हुआ। अगले साल जब वो हज के लिए काबा आए, तो सहाबा ने बदला लेने का इरादा किया, लेकिन रसूल ﷺ ने रोक दिया। यह आयत उसी पर उतरी — कि बदले के नाम पर दीन का कोई हुक्म न तोड़ा जाए।
यह इजाज़त का हुक्म है: जब एहराम से बाहर आ जाओ, तो शिकार करना जायज़ है। यह हुक्म इतना अटल है कि इसे न मानना कुफ़्र है।
चाहे हुक्म फ़र्ज़ हो, वाजिब हो या मुस्तहब — किसी यक़ीनी हुक्म का इनकार करना कुफ्र है।
हुदैबिया के मौक़े पर काफ़िरों ने रसूल ﷺ को उमरा से रोका, लेकिन आपने बदले में उन्हें रोकने का हुक्म नहीं दिया।
अब, उनके कुफ़्र के कारण काफ़िरों को काबा में दाख़िल होने से मना कर दिया गया, जैसा कि कुरआन फ़रमाता है: "मशरिक़ीन नापाक हैं, इसलिए अब वे मस्जिद-ए-हराम के क़रीब न आएं।" (सूरह तौबा: 28)
इससे दो बातें साबित होती हैं:
गुनाह में किसी की मदद करना भी गुनाह है। चोरी, डकैती या चोरी का सामान छिपाना — ये सब गुनाह हैं।
इसके उलट, नेकी के कामों में मदद देना, भलाई के लिए बढ़ाना — यह अल्लाह के यहाँ सवाब का बाइ'स है।
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